बाघ अब नहीं जीते। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो 2015 तक ये चर्चा हम आप कर रहे होंगे। ऐसा वन्य जीव विशेषज्ञों का मानना है। आज कौन मानेगा कि सौ साल पहले अपने देश में लाख की तादात में बाघ जीते थे और अपने होने का दम भरते दहाड रहे होते थे। 6 साल पहले बाघों की ये तादात घटकर 3600 हो गई और 2008 में ये संख्या चैंकाने की हद पर पहुंचते हुए 1411 जा पहुंची। 2005 के सरकारी आंकणों के मुताबिक राजस्थान के सरिस्का टाईगर रिजर्व में मौजूद सभी 26 बाघ विलुप्त हो गये। 6 साल पहले टाईगर स्टेट के नाम से जाने जाने वाले मध्य प्रदेश के पन्ना टाईगर रिजर्व में मौजूद 44 बाघ आज की तारीख में इतिहास हो गये हैं। बाघों को बचाने के लिये बनी नेश्नल टाईगर कन्वेंशन अथोरिटी की एक रिपोर्ट बताती है कि 2007 में 41 और 2008 में 53 बाघ देश भर में मौत की नीद सो गये और 2009 के पहली छमाही में ही 45 बाघ मर गये और साल के जाते जाते ये संख्या 86 पहुंच गई। पयावरणविद दावा कर रहे हैं कि आज देशभर में मुश्किल से 1000 बाघ रह गये हैं। इन 1000 बाघों को बचाया ना गया तो 2015 ज्यादा दूर नहीं लगता। आज “सेव टाईगर्स” के नारे देशभर में पोस्टरों, बैनरों, अखबारों, रेडियो और टीवी विज्ञापनों में तैर रहे हैं। लोग बाघों के जीवन के लिये चिन्तित नजर आ रहे हैं। 1972 में कार्बेट नेश्नल पार्क से प्रोजेक्ट टाईगर नाम से शुरू की गयी सरकारी योजना आज जबरदस्त रूप से प्रासांगिक हो गई है। एयरसेल ने ताजा ताजा एक केम्पेन सेव अवर टाईगर नाम से शरू किया है। एनडीटीवी भी पहले ही इसके लिये एक केम्पेन चला चुका है। दरअसल बाघों की ये दातात कैसे आश्चर्यजनक तरीके से कमती चली गई। कैसे इन कुछ सौ सालों में देशभर के हजारों बाघ गायब होने की जद पर आ पहुंचे। कैसे हम इतने बेपरवाह शिकारी हो गये कि हमने अपने राश्ट्रीय पशु को मरने के लिये छोड दिया। इन सवालों की परतें अपनी जडों तक बडी गहरी हैं। बाघों की तस्करी के अन्तर्राश्ट्रीय बाजार में भारत से तिब्बत के जरिये चीन तक उनकी खालों के व्यापार की खबरें पिछले कई सालों से छनती हुई मीडिया में पहुंचती रही हैं।
और अब जबकि बाघों की विलुप्ति की खबरों के सच होने के दिन नजदीक आते लग रहे हैं हमें उनकी चिन्ता सता रही है। देशभर में 38 से ज्यादा टागर रिजर्व उनके संरक्षण के नाम पर बने तो सही पर मौजूदा हाल साफ कर देता है कि वो कितने सफल रहे। या कहना बेहतर होगा कि कितने नाकामयाब रहे। खैर हालात जब इतने बिगडे हैं तो कम से कम हमें जागने की सूझी है। हम जो कर सकते हैं वो यही है कि उनके बचाव के लिये काम कर रहे जागरूकता अभ्यिानों से किसी न किसी तरह जुडें। अपनी ओर से जागरूकता लाने का प्रयास करें। हो सके तो कोई पहल करें। अगले कुछ सौ सालों तक बाघ जीते हुए दहाड सके तो पर्यावरण संरक्षण के लिए ये हमारी बडी मदद होगी।


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