नदियाँ किसी भी देश की जीवनदायनी शक्ति होती है .भारत की 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी नदियों से ही अपनी अजीविका कमाने में सक्षम हो पाती है . वहीँ इस देश में नदियों को आपस में जोडने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना अब ठंडे बस्ते में जा पहुंची है
बिना आधार के और बिना तथ्य के इस परियोजना को बंद किया जाना औचित्य पूर्ण कार्य नहीं था। कम से कम इस घटना को नकारने से पहले इसके ठोस और तथ्यपरक कारण जरूर निश्चित किए जाने चाहिए थे ?
नदियों को परस्पर जोड़ने का विचार सबसे पहले समाजवादी विचारक डॉ राममनोहर लोहिया की ही देन थी . उन्होंने ये सपना देखा कि इस परियोजना मेंबाढ़ प्रभावित और सूखाग्रस्त क्षेत्रों में नदियों को मोडकर पूरे देश की जल समस्या का निदान किया जा सके।
लेकिन उस समय अनाज की पैदावार पर ही ज्यादा बल दिया जा रहा था . इस ओर कोई कारगर कदम नहीं उठाये गए . 80 के दशक में
सरकार ने राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण को अस्तित्व में लाकर इस दिशा में व्यापक कदम उठाए ।
एनडीए के शासन काल में अटल सरकार ने नदियों को जोडने की देशव्यापी परियोजना बनाई और उसे धरातल पर लाने के लिए कुछ राज्यों के बीच इस मंशा पूर्ति के लिए अनुबंध भी संपादित हुए । नतीजतन कागजों में नदियों को जोडने वाले नक़्शे भी तैयार कर लिए गए। पर केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेंश ने अचानक से इस परियोजना को बड़े पैमाने पर तबाही के तर्क के साथ नामंजूर कर दिया । अगर इस परियोजना को लागू करने में केन्द्रीय सरकार के पर्यावरण विभाग को कुछ समस्याओं का सामना करना पडता । सबसे बडी समस्या की इन छोटी या सह नदियों को बनाने में लगने वाली एक बड़ी राशी के आबंटन की होती । क्योंकि कार्य बड़े व्यापक स्तर पर किया जाता तो बहुत से पैसे की आवश्यकता होती . दूसरा बडा कारण विस्थापन जैसी बडी समस्या का सामना भारत की केद्र और राज्य सरकार को करना पडता ।और समय सीमा बहुत लंबी होती ।
अगर नई नदियां बनती तो इसकी क्या गारंटी है की उनका हाल दिल्ली की यमुना या और बाकी नदियों की तरह नही होने दिया जाता ?
जहां इस समस्या के इतनी घाटे है वहीं इसके बहुत से महत्वपूर्ण फायदे भी है .सह नदियों के बनने से सबसे बडा फायदा किसानों और अन्य लघु उधोगों के लिए होता ।एक तरफ किसान पानी की कमी से साल में एक या दो फसल से ज्यादा फसले उगाने में सक्षम नहीं हो पाते थे वहीं दूसरी और इन सह नदियों के किनारे छोटे लघु उधोग पनपते जैसे पनचक्की ,पनबिजली ,मछली पालन ,पर्यटन केद्र का विकास आदि ……
इसका दूसरा सबसे बड़ा फायदा बाढ़ से बचाव होता ,हर साल जब भी नदिया उफान पर आती तो ज्यादा पानी को सहायक नदियों में छोड दिया जाता । एक और हरित क्रांन्ति का सपना देखा जा सकता था देश की जल संबंधी समस्याओ का निदान हो जाता .सबसे बडा काम ये होता कि इस परियोजना के अंदर नदियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता .
खेती के लायक 1411 लाख हेक्टेयर भूमि में से 546 लाख हेक्टेयर भूमि इनहीं नदियों की बदौलत हर वार सिंचित की जाती है शायद हम इस परियोजना के माध्यम से 1000या1200 लाख हेक्टेयर भूमि सीचने में सक्षम हो जाते ।
पर्यावरण मंत्री को इतनी बड़ी राष्ट्र हित की बात को बिना तर्क के यू ही नहीं नकारना चाहिए था. क्योंकि इस परियोजना पर पहले से 50 करोड से ज्यादा धन राशी खर्च हो चुकी है। कम से कम इस परियोंजना को एक क्षेत्र विशेष में लागू कर उसके होने वाले हानी लाभ की गणना जरूर करनी चाहिए थी और फिर उसके बाद किसी निर्णय पर पहुंचना चाहिए था. इस परियोजना के चलते कावेरी जल विवाद ,चंबल नदी से राजिस्थान और मध्यप्रदेश में होने वाले जल विवाद जैसी समस्याओं का सामाधान करने में बहुत मदद मिलती।
एनडीए सरकार ने इस परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य 2015 तक रखा था यानी 11 साल में इस परियोजना को पूरा कर दिया जाता और अगर इस परियोजना को उतनी ही तत्परता से लागू किया जाता तो इसके कुछ अच्छे परिणाम आज हमारे समक्ष होते .

