सोलर वेली के साथ गोबर वेली भी बने

भारत को गांवों का देश कहा जाता है. अर्थात भारत को पहचान देने वाली विशेषताओं एवं जीवनशक्ति प्रदान करने वाले कारकों की नींव ग्रामीण व्यवस्था पर टिकी होती है. भारत की जीवन दायिनी ग्रामीण ताने-बाने का आधार है कृषि , जो आज के आई टी युग में में भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है . और भारत के रीढ़ की यह हड्डी को बचाए रखने में गौवंश का योगदान नकार पाना कठिन है . दरअसल भारत और गाय का सम्बंध आर्थिक, चिकित्सकीय ,पर्यावरणीय और सांस्कृतिक रूप से सार्वभौमिक है। गाय की सांस्कृतिक महत्ता को इस बात से आँका जा सकता है कि इसमें सभी तैंतीस करोड देवताओं का वास बताया गया है। एक भारतीय जीवन से लेकर मरण तक गोमाता से जुड़ा होता है। पैदा होने पर गाय के गोबर से ‘लीपकर’ घर में स्वागत किया जाता है और अंत समय उसका परिवार गोदान कर उसे ‘वैतरणी’ पार कराता है।
गौ के अतिरिक्त शायद ही कोई ऐसा जीव है जिसके मल-मूत्र में मानव जाति के काम आता हो .जहाँ असाध्य से असाध्य रोगों के इलाज में गौ-मूत्र रामबाण का काम करता है वहीँ गाय के गोबर से न केवल घर का चूल्हा जलता है बल्कि खेतों में इससे बने खाद से बेहतरीन पैदावार होती जिनका स्वास्थ्य और स्वाद की दृष्टि से कोई तोड़ नहीं है . कई लोगों का तो यहाँ तक कहना है गोबर से बने उपले पर पके भोजन का स्वाद गैस पर बने भोजन से कहीं स्वादिष्ट होता है . देश -विदेश के जैविक वैज्ञानिकों ,डॉक्टरों का में मानना है कि आज की अधिकांश बीमारियाँ रसायनयुक्त भोज्य पदार्थों के सेवन से होती है . रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से चिंतित पर्यावरणविदों ने कृषकों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहन की बात रखी है . जैविक खेती की चौतरफा मांग ने गाय की महत्ता को जोरदार तरीके से उजागर किया है . गाय से प्राप्त होने वाले विभिन्न अपशिष्ट पदार्थ में औषधीय गुणों से भरपूर है ऐसा आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का में मानना है . आज अपने औषधीय गुणों के कारण ही गोचिकित्सा एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रुप में जनसाधारण में लोकप्रिय हो रही है। गोमूत्र में कैंसररोधी तत्वों के पाए जाने की पुष्टि खुद आधुनिक विज्ञान ने अपने शोध में किया है .
पर्यावरण संतुलित का श्रेय में गौ-वंश के खाते में जाता है . गोबर-गैस संयंत्रों का उपयोग खाना बनाने के लिए इंधन के रुप में किया जाता रहा है और आज में कई प्रकृति प्रेमियों के घर में इसका उपयोंग हो रहा है . देखा जाए तो गोबर-गैस संयंत्रों के गायब होने के पीछे में सरकार का नाकारापन और सत्ताधीशों की मुनाफापरस्ती है . आज अगर कोई चाहे में तो गोबर-गैस संयंत्रों बैठने की हिम्मत नहीं पटती . आज पर्यावरण को लेकर मंत्री-संतरी कोपेनहेगन की दौड़ लगा आते हैं परन्तु अपने घर के पारंपरिक तरीकों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है . हो भी क्यों ! गाय-गाँव की बात करके किसानों का फायदा होगा पर उनकी कमीशन तो नहीं बनेगी ना ! लेकिन नेताओं के भरोसे रहकर हम क्यों अपना भविष्य चौपट कर रहे हैं ? क्या पर्यावरण को संतुलित करने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है ? फिर क्यों न एक पहल हमारे-आपके बीच से शुरू हो ? गांवों ,कस्बों ,शहरों में गौ-पालन पर विशेष जोर दिया जाए . सामूहिक गोबर-गैस संयंत्रों की स्थापना की जाए . . ध्यान रहे ये कोरी बातें नहीं हैं . इन संयंत्रों से कार्बन उत्सर्जन में कमी के साथ रासायनिक खादों के विकल्प के रुप में हमे जैविक खाद भी मिलेगी। गोबर से बिजली प्राप्त करके हम स्वावलम्बी ऊर्जागृह का निर्माण कर सकते हैं। इससे हमारी आत्मनिर्भरता बढती जाएगी और वो दिन में आएगा जब किसी राज्य को पडोसी राज्य से ऊँचे दर पर बिजली खरीदने की जरुरत नही रहेगी .भारत को अपनी पगड़ी अर्थात सम्प्रभुता को गिरवी रखकर अमेरिका के साथ कोई परमाणु समझौता करने की नौबत नहीं आएगी। नेताओं की मुनाफाखोरी के लिए भारत का धन जो यूँ ही बर्बाद किया जा रहा उसे जनहित के कामों में लगाया जा सकेगा . बहरहाल , प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने की शक्ति हमें ईश्वर प्रदान करें इसी आशा के साथ और सभी को नए साल और नये दशक की हार्दिक शुभकामनाएं !

3 Comments

  • बिलकुल होनी चाहिए . पर्यावरण में प्रदुषण बढ़ता जा रहा है . परमाणु उर्जा उत्तपन्न करने में कितना पैसा और कठिनाई है इसका अंदाजा हमारी सरकार को नही है शयद ! अगर एक बार परमाणु विकिरण फैला तो लाखों जाने जाएगी लेकिन किसको फिकर है ? आपने ठीक लिखा है कि अब हमें खुद जागना होगा आखिर कब तक सरकार के ऊपर रोते रहेंगे . मुझे वेडनस डे फिल्म की याद आगयी जिसमें नसुरुद्दीन शाह कहते हैं अपना घर है और खुद उसकी सफाई कर रहे हैं तो आज हमें कम से कम प्रकृति के मामले में तो अपना घर खुद ही साफ़ करना ही होगा . गोबर गैस प्लांट योजना को पंचायत स्तर पर कार्यान्वित किया जाए तो बिजली और चूल्हा चक्की की समस्या हल होने के साथ पैसों और पर्यावरण की सुरख्सा भी होगी और अपनी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी .

  • मेरे विचार से हम सभी को इस विषय पर चेतना चाहिये.आज भारत से मांस का निर्यात कर गोवंश समाप्त किया जा रहा है.इस स्थिति में भी बदलाव की आवश्यकता है.गो पालन को हर स्तर पर प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है.

  • sabse pahle to hame roj subaha ki chaye ke liye jo doodh deti he oos go mata ki jaan par ho rahe har prakar ke atyachar ka khatmaa karne ke liye ek kadam uthana padega sirf baton se hi kaam nahi chalega .logon ko samne aakar gomata ke liye desh me ho rahe go kalyanaarth seva karyon ko badhaava dekar unke liye daan karna hoga or jahaan bhi gomata lachar avasthaa me mile uske upchaar evam ghaans ki vyavasthaa kare.
    ……….. Dhanyavaad

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