आज आजादी के 62 वर्षों बाद भी किसानों का शोषण-उत्पीड़न बन्द नहीं हुआ है।विभिन्न सरकारी योजनाओं के लिए मनमाने तरीके से किसानों की उर्वरा भूमि का अधिग्रहण जन विरोधी कृत्य है। अपने अथक परिश्रम से जिस भूमि पर अपना खून पसीना बहा कर तपती दोपहरी में भयानक सर्द मौसम में और भीषण बरसात में सपरिवार दिलो-जान लगा कर अपना और अपने परिवार एवं समाज के उदर पोषण हेतु अन्न उपजाता है. वही भूमि विकास के नाम पर अधिग्रहीत कर के कंक्रीट के जंगलों में बदल दी जा रही है। सम्पूर्ण देश में भूमि अधिग्रहण के मामलों ने किसानों से उनका हक छीन लिया है। विभिन्न सरकारी आवासीय योजनाओं के लिए कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण तो बदस्तूर जारी ही है. प्रापर्टी डीलरों ने भी किसानों की जमीनों की खरीद-फरोख्त कर के मोटा पैसा कमाने के साथ ही साथ भारत की कृषि आधारित व्यवस्था को बरबाद करने में और किसानों को बर्बादी, शराब खोरी तथा बेरोजगारी की तरफ ढकेलने जैसा कार्य किया है। भूमाफियाओं के काले कारनामें अखबारों की सुर्खियां बनते रहते हैं। विभिन्न अदालतों में भी भूमि सम्बन्धित मामले लम्बित पड़े हैं। धार्मिक स्थल, कब्रिस्तान की जमीनें भी जमीन के इन दलालों ने नहीं छोड़ी हैं। रही-सही कसर किसानों की बेशकीमती उर्वरा भूमि पर शासन-प्रशासन की दृष्टि ने पूरी कर दी है। ग्राम समाज, बंजर, नजूल आदि जमीनों के रहते हुए कृषि योग्य उर्वरा भूमि का अधिग्रहण, ब्रितानिया जुल्मों सितम् की याद दिलाता है। किसानों का कोई पुरसा हाल नहीं है. आम जन मॅंहगाई के बोझ तले कराह रहा है। भारत के वर्तमान कृषि मंत्री सत्ता मद में चूर हो कर बार-बार कालाबाजारियों को शह देने वाले गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य देकर हिन्दुस्तान की रियाया का मजाक उड़ा रहें हैं। किसानों के हितों आम जनता के हितों के बजाए कृषि मंत्री मिल मालिकों व जमाखोरों को प्रोत्साहन देने का जन विरोधी कार्य करने में मशगूल हैं। आज किसान बेबस होकर अपनी शक्ति से आन्दोलन की राह पर खड़ा है। भूमि अधिग्रहण, चकबन्दी, नहर कटान, बाढ़ की विभिषिका, नकली खाद, बीजों की कमी, कृषि लागत में वृद्धि, शैक्षिक स्थिति, स्वास्थ्य-परक समस्याओं से जूझ रहा किसान आज ठगा जा रहा है। दुर्भाग्य वश किसानों का नेतृत्व भी किसानों की शक्ति के बल पर, इनको संगठित कर के अपनी राजनैतिक हैसियत, आर्थिक मजबूती बनाने में लगा रहता है। अधिकारों की बहाली व प्राप्ति के संघर्ष के स्थान पर समझौतों की परिपाटी डाल रखी है, किसानों के इन रहनुमाओं ने। किसान वर्षों से अपनी समस्याओं से जूझ रहा है और राजनीति व नौकरशाही के गठजोड़ में किसानों का शोषण अनवरत् जारी है।
महात्मा गाँधी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, सर छोटूराम, चैधरी चरण सिंह, डा0राम मनोहर लोहिया, लोक नायक जय प्रकाश नारायण, विनोबा भावे जैसी शख्सियतों के विचार और उनके जीवन संघर्ष तथा युग दृष्टा सरदार भगत सिंह के किसानों के लिए तैयार किये गये क्रान्तिकारी कार्यक्रम व विचार हमारे लिए प्रेरणा श्रोत हैं। इनके आदर्शों को व्यवहार में लाने से ही कृषि आधारित भारत समृद्ध व सशक्त बनेगा। अब किसानों के हित की लड़ाई लड़ने वाले व्यक्तियों व संगठनों को वर्चस्व की लड़ाई बन्द कर देनी चाहिए। राजनैतिक पद प्राप्ति के लिए किसान शक्ति का संयोजन व दुरूपयोग दुर्भाग्यपूर्ण है, इस पर अंकुश किसानों को ही लगाना पड़ेगा। राजनैतिक इच्छा रखने वाले किसी भी संगठन और व्यक्ति से अपना जुड़ाव न करके किसान ऐसा कर सकते हैं।
किसान संगठनों को कृषि योग्य उर्वरा भूमि के अधिग्रहण के विरोध में, किसान अधिकारों की बहाली व शोषण से मुक्ति के लिए वैसा ही संघर्ष करना चाहिए जैसा कि ब्रितानिया हुकूमत के दौरान सरदार पटेल ने किसानों पर लगान वृद्धि के खिलाफ, बारदौली में लड़ी और जीती थी। अभी जिस तरह सिंगूर से ममता बनर्जी ने देश के बड़े उद्योगपति टाटा और शासन को खदेड़ा और किसान-मजदूर शक्ति की लाज रखी, उसका नेतृत्व किया, वो ‘‘दुर्गा-स्वरूपा’’ किसानों-मजदूरों की दुःख हरता बनीं, उसकी चहुमुखी प्रशंसा हुई। समस्त राजनैतिक दलों को अन्नदाता किसानों की कृषि योग्य भूमि के अनवरत् हो रहे अधिग्रहण के खिलाफ सदन में आवाज उठानी चाहिए। खेती की कीमत पर कंक्रीट के जंगलों से किसी का पेट नही भरेगा। आज जरूरत कृषि को प्रोत्साहित करने की है न कि कृषि योग्य भूमि की बलि अनियंत्रित व अनियोजित विकास पर चढ़ाने की। कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण के विरोध में किसान आन्दोलन की आवश्यकता है।
कृषि आधरित भारत की संरचना महात्मा गाँधी के ग्राम्य स्वराज्य की अवधारणा, आज हमारे हुक्मरानों की अनियंत्रित और जनविरोधी विकास की भेंट चढ़ रहीं हैं। आज किसानों के द्वारा ‘‘सरदार’’ की उपाधि से विभूषित वल्लभ भाई पटेल को अपना आदर्श मानने वालों को किसानों के हित की लड़ाई में अपना सर्वस्व दाव पर लगा देना चाहिए। सरदार वल्लभ भाई पटेल को सच्ची श्रद्धाजंली होगी-किसानों की कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण का बन्द होना। ‘‘जय जवान-जय किसान’’ का उद्घोष करने वाले लाल बहादुर शास्त्री की आत्मा अवश्य ही कृषि योग्य भूमि पर फैल रहे इन कंक्रीट की इमारतों को देखकर रोती होगी। किसानों के नेता चैधरी चरण सिंह के अनुयायियों को कृषि योग्य भूमि के इस हरण को रोकने के लिए संग्राम करना ही चाहिए। युग दृष्टा सरदार भगत सिंह ने कहा था, -‘‘वास्तविक क्रांतिकारी सेनायें तो गावों और कारखानों में हैं। ’’आज क्रान्तिकारी विचारों के वाहकों को किसानों की भूमि अधिग्रहण के विरोध के संघर्ष को अपनी भावना और उच्चतम त्याग की परम्परा से विजय में बदलने के लिए आगे आना चाहिए। यह दुर्भाग्य ही है कि आजादी की लड़ाई में ब्रितानिया हुकूमत को असहयोग आन्दोलन के साथ-साथ सशस्त्र आन्दोलन से परास्त करने वाला अन्नदाता किसान, आज आजाद भारत में पुनः अपने हक की लड़ाई, गोरे अंग्रेजों की जगह काले-भूरे अंग्रेज परस्त लोगों से लड़ने को मजबूर है। अब अन्नदाता किसानों की भूमि के अधिग्रहण का विरोध प्रत्येक नागरिक को करना चाहिए। हरी-भरी उर्वरा भूमि के विनाश की कीमत पर विकास, रोजगार और कंक्रीट के जंगल नहीं चाहिए – यह आवाज सरकारों तक पहुचानी है।

