विविध|2010/07/24 11:23 am

‘‘अल्जाइमर के उपचार में संगीत-चिकित्सा’’

अल्जाइमर अथवा विस्मृति रोग वृद्धावस्था का एक असाध्य रोग माना गया है। सन् 1906 में जर्मन डॉ ओलोए अल्जीमीर ने एक महीला के दिमाग के परीक्षण में पाया कि उसमें कुछ गांठे पड़ गई हैं, जिन्हें चिकित्सक ‘प्लेट’ कहतें हैं। यही रोग उस डॉ के नाम पर अल्जाइमर रोग कहलाया जाने लगा। यह रोग भूलने का रोग है, जिसमें रोगी धीरे -धीरे सब कुछ भूलने लग जाता है। यहां तक कि वह स्वयं को भी भूल जाता है। शुरू -शुरू में वह चीजों के रखने का स्थान, किसी व्यक्ति का नाम, टेलीफोन नम्बर आदि भूलने लगता है। उसे अपना चश्मा ढूंढ़ने में समय लग सकता है, या उसे याद नहीं रहता कि उसने चाबी कहां रखी है, किसी परिचित के मिलने पर उसका नाम याद नहीं आता। ऐसी अवस्था हो तो सम्भव है कि वह व्यक्ति अल्जाइमर रोग से पीड़ित हो।

इस रोग की तीन अवस्थाएं होती हैं। मन्द, मध्यम और गंभीर। पहली मंद अवस्था में नाम अथवा संख्या भूलना और मानसिक संतुलन में गड़बड़ी होना हो सकता है। मध्यम अवस्था में घबराहट, उलझन, अस्त-व्यस्तता तथा रोगी के व्यक्तित्व में शोचनीय परिर्वतन नजर आता है, उसके मानसिक संतुलन में भी अत्यधिक गड़बड़ी दृष्टिगत होती है। तीसरी और अन्तिम अवस्था गम्भीर होती है और रोगी को कपड़े पहनने तथा मूत्र और शौच त्याग आदि का भी ध्यान नहीं रहता। भोजन से लेकर सोने तक वह सब कुछ भूल जाता है। अभी तक इस रोग के निवारण के लिए चिकित्सक किसी दवा को नहीं खोज पाए हैं।

कुछ विशेष सावधनियां रखने पर इस रोग से कुछ हद तक बचा जा सकता है। यदि आप साठ वर्ष की आयु के आस पास हैं, तो इस रोग की जानकारी आपको अवश्य होनी चाहिए। इस रोग के इलाज के लिए खोज जारी है। पर इसके परिणाम अभी काफी दूर हैं। इस रोग में मस्तिष्क की कोशिकाएं ;Nerve cells क्षति ग्रस्त हो जाती हैं, अतः कुछ ऐसी दिमागी कसरत करने की सलाह दी जाती है जिससे दिमाग सक्रिय रहे।

आज चिकित्सा जगत में  ‘संगीत द्वारा चिकित्सा’ नाम से एक अत्यन्त विकसित विद्या धारा का प्रयोग हो रहा है। विभिन्न प्रकार के संगीत का प्रयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए किया जाता है। इस दिशा में भारतीय शास्त्रीय संगीत अत्यन्त उपयोगी सि( हुआ है। एक लम्बे अर्से के विभिन्न प्रयोगों के आधार पर यह सि( किया गया है कि संगीत द्वारा मनोव्यवहार प्रभावित होता है। संगीत द्वारा मानसिक अवरोध, अवसाद, अत्यधिक उत्तेजना, विस्मृति रोग, सीजोफरेनिया और ऐपीलैप्सी आदि मानसिक रोगों का समाधान भी किया जाता है। इन सभी पर सफल प्रयोग किए जा चुके हैं। संगीत का ऐसा प्रयोग audio analgesic के रूप में अर्थात् ‘‘संगीत श्रवण’’ द्वारा चिकित्सा के रूप में किया जाता है। यद्यपि डाॅक्टर अभी तक इस परिणाम तक नहीं पहुंचे हैं कि संगीत सुनने से मानव शरीर पर क्या निश्चित न्यूरोलोजिकल प्रभाव होते हैं तथापि भारतीय शास्त्रीय संगीत में हमें सातवीं शताब्दी के मतंगमुनि कृत ‘‘व्रिहद्वेशी ’’ ग्रंथ में ऐसे सन्दर्भ प्राप्त होते हैं जिनके आधार पर नाद, श्रुति, स्वर और रागों के विशेष प्रभावों को प्रस्थापित किया गया है।

भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा के आधार पर कहा गया है कि सभी बिमारियां शरीर रचना विज्ञान के अनुसार बात, पित्त और कफ दोषों के कारण होती हैं। इन दोषों के निवारण में रागों के समय सिद्धांत के अनुसार संगीत चिकित्सा का लाभ मिलता है। यथा ऐसे राग जो इन दोषों के प्रतिरोधी हैं। अनुसंधानों के परिणाम स्वरूप ऐसे रोगों को चिन्हित किया गया है। अनुसंधनों में यह भी पाया गया है कि प्रतिदिन दो या तीन बार संगीत चिकित्सक द्वारा निर्धारित राग सुनाने से 20 या 25 दिनों में ही कुछ विशेष बीमारियों में लाभ हुआ है। डॉ आलिवर स्मिथ जो एक प्रसि( न्यूरोलोजिस्ट हैं, उन्होंने न्यूरोलोजिकल डिसओर्डर में संगीत चिकित्सा को विशेष उपयोगी पाया है। यह कपेवतकमत पारकिन्सन और एल्जाइमर रोगों का कारण है। उनका विचार है कि “It is because of musicea unique capacity to organçe and reorgançe cerebral functions” संगीत चिकित्सक इन रोगों में ‘राग शिवरंजनी’ के प्रयोग की स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए विशेष सलाह देते हैं। बांसुरी जैसे वाद्यों पर 20 से 25 मिनट हिंडोल, पूरिया, तोड़ी, आनन्दी और भैरवी राग सुनकर उच्चरक्त चाप, तनाव आदि मस्तिष्क से सम्बन्धित रोगों पर नियन्त्रण किया जा सकता है।

संगीत चिकित्सा एक अत्यन्त विकसित और वैज्ञानिक प(ति है। इस प(ति की चिकित्सा से न्यूरो हारमोन्स का स्तर बढ़ जाता है और इससे प्राकृतिक तौर पर दर्द निवारण, मानसिक तनाव तथा विस्मृति दूर करने का प्रभाव होता है।अनुसंधानों से पाया गया कि ऐसे रोगियों में संगीत श्रवण से वैसा ही प्रभाव हुआ जितना कि 10 mg.k~ बेलियम की गोली लेने से होता है।

संगीत का सम्बन्ध सीधा मन से होता है। अतः ऐसी मानसिक स्थिति में संगीत के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती। संगीत सुखद एवं मंगलकारी कला है, अतः अच्छा संगीत सुनिए और इसके माध्यम से तनाव मुक्त होकर संतुलित जीवन जीएं।

1 Comment

  • डॉ राजेश कपूर

    कृपया ध्यान दें की उपरोक्त लेखक डा. मनोरमा शर्मा जी का है जो कि मेरी गलती से मेरे नाम पर मेरे द्वारा भेज दिया गया और छप गया. कृपया लेखक के नाम में संशोधन करके पढ़ें.
    संगीत पर शोध करनेवाली डा. मनोरमा शर्मा हिमाचल के शिमला नगर में निवास करती हैं और वे ही उपरोक्त लेख की लेखिका हैं.

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