विविध|2009/11/18 6:33 pm

हिंदी महिमा ( भाग -1)

राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। – अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। – बाबूराम सक्सेना।

समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। – (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।

हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। – शंकरराव कप्पीकेरी।

अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।

राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। – अनंत गोपाल शेवड़े।

दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। – के.सी. सारंगमठ।

हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। – वी. कृष्णस्वामी अय्यर।

राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। – बालकृष्ण शर्मा नवीन

विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। – वाल्टर चेनिंग।

हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। – बेरिस कल्यएव।

अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है। – सम्पूर्णानंद।

एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित। – केशवचंद्र सेन।

देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है। – सेठ गोविंददास।

इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। – राहुल सांकृत्यायन।

समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है। -सर जार्ज ग्रियर्सन।

मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। – चंद्रबली पांडेय।

भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। – नलिनविलोचन शर्मा।

जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। – (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।

यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। – शिवनंदन सहाय।

प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है। – (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।

अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। – भवानीदयाल संन्यासी।

यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? – चंद्रशेखर मिश्र।

साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। – महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।

जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। – (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।

भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। – टी. माधवराव।

हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। – र. रा. दिवाकर।

यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। – राजेन्द्र प्रसाद।

उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है। – मुहम्मद हुसैन आजाद

समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। – जनार्दनप्रसाद झा द्विज

मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। – राहुल सांकृत्यायन।

शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। – शिवप्रसाद सितारेहिंद।

हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। – (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।

वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। – पीर मुहम्मद मूनिस।

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। – शिवपूजन सहाय।

चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै। – बेनी कवि।

यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। – ब्रजनंदन दास।

देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। – साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।

हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। – छविनाथ पांडेय।

देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। – रविशंकर शुक्ल।

हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है। – राहुल सांकृत्यायन।

नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। – गोपाललाल खत्री।

साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। – गणेशशंकर विद्यार्थी।

अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती। – पं. कृ. पिल्लयार।

उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। – शारदाचरण मित्र।

हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है। – जगन्नाथप्रसाद मिश्र।

हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। – देवव्रत शास्त्री।

हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता। – गोविन्दवल्लभ पंत।

भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है। – रविशंकर शुक्ल।

किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय। – ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।

भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है। – माधव शुक्ल।

संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। – डॉ. फादर कामिल बुल्के।

भाषा विचार की पोशाक है। – डॉ. जानसन।

रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है। – यशोदानंदन अखौरी।

साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। – रामवृक्ष बेनीपुरी।

कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं। – श्रीनारायण चतुर्वेदी।

हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। – राजेंद्रप्रसाद।

देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है? – शिवपूजन सहाय।

जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। – देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप। – राधाचरण गोस्वामी।

हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। – शारदाचरण मित्र।

हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। – कमलापति त्रिपाठी।

मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता। – मनोरंजन प्रसाद।

हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। – सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।

नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। – (प्रो.) तान युन् शान।

राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है। – कमलापति त्रिपाठी।

सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए। – श्रीधर पाठक।

भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है। – शारदाचरण मित्र।

हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। – धीरेन्द्र वर्मा।

जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। – सेठ गोविंददास।

कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। – शेली।

भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है। – लक्ष्मीनारायण सुधांशु

भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है। – सम्पूर्णानन्द।

हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। – पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। – हरगोविंद सिंह।

अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। – अनंतशयनम् आयंगार।

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। – मैथिलीशरण गुप्त।

दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है। – अज्ञात।

वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। – बिस्मार्क।

हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है। – गोपाललाल खत्री।

कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। – हजारी प्रसाद द्विवेदी।

हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है। – भूदेव मुखर्जी।

हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। – सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।

हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है। – नन्ददुलारे वाजपेयी।

अकबर की सभा में सूर के जसुदा बार-बार यह भाखै पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।- राधाचरण गोस्वामी।

देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। – सुधाकर द्विवेदी।

हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी। – (डॉ.) भगवानदास।

हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। – मैथिलीशरण गुप्त।

वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है। – ठाकुरदत्त शर्मा।

निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है। – पंडित सुधाकर पांडेय।

अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है। – रविशंकर शुक्ल।

बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है। – भवानीदयाल संन्यासी।

यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है। – दरियाये लताफत।

भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है। – (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।

अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता। – देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद।

हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति। – रामवृक्ष बेनीपुरी।

बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती। – संपूर्णानंद।

भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है। – बदरीनाथ शर्मा।

तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई। – शिवपूजन सहाय।

अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। – महात्मा गाँधी।

हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन।

भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है। – स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।

हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।- मथुरा प्रसाद दीक्षित।

भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।- रवींद्रनाथ ठाकुर।

इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता। – (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।

संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है। – केशवचंद्र सेन।

हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है। – गोविंदबल्लभ पंत।

हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था। – सेठ गोविंददास।

हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है। – (डॉ.) रामविलास शर्मा।

जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। – सेठ गोविंददास।

साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है। – (म. म.) सत्यनारायण शर्मा।

जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं। – शिवनंदन सहाय।

उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दू दाँ तक तंग आ गए हैं। – राहुल सांकृत्यायन।

मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती। – मैथिलीशरण गुप्त।

गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है। – सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है। – ब्रजभूषण पांडेय।

लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है। – कंक।

मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता। – र. रा. दिवाकर।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। – महावीर प्रसाद द्विवेदी।

हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है। – राहुल सांकृत्यायन।

किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके। – (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।

साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है। – अंबाप्रसाद सुमन।

हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है। – पं. गिरिधर शर्मा।

हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। – वासुदेवशरण अग्रवाल।

भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है। – (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।

क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था। – विष्णुदेव पौद्दार।

सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है। – वाल्टर चेनिंग।

हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है। – जहूरबख्श।

किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा। – सैयद इंशा अल्ला खाँ।

अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है – संपूर्णानंद।

हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए। – रविशंकर शुक्ल।

हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है। – छविनाथ पांडेय।

साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है। – पार्वती देवी।

विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं। – चंद्रबली पांडेय।

भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है। – राहुल सांकृत्यायन।

जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता – वासुदेवशरण अग्रवाल।

पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है। – अज्ञात।

समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती। – पं. सुधाकर पांडेय।

तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती। – मौलाना मुहम्मद अली।

भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। – रामवृक्ष बेनीपुरी।

हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। – पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है। – शांतानंद नाथ।

भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए। – नाथूराम शंकर शर्मा।

राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए। – राजकुमार वर्मा।

हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है। – सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।

स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है। – निराला।

कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है। – सुमित्रानंदन पंत।

बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। – गोविंद शास्त्री दुगवेकर।

उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है। – रामरणविजय सिंह।

राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। – श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।

बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी। – पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी।

जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि। – देवी प्रसाद गुप्त।

हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है। – शांतानंद नाथ।

आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है। – माखनलाल चतुर्वेदी।

विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है। – सूर्यनारायण व्यास।

कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। – सैयद अमीर अली मीर

हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है। – ब्रजनंदन सहाय।

कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है। – रामचंद्र शुक्ल।

हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है। – चंद्रबली पांडेय।

जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं। – माधवराव सप्रे।

कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है। – सू. च. धर।

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। – विनोबा भावे।

आज का आविष्कार कल का साहित्य है। – माखनलाल चतुर्वेदी।

भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं। – राहुल सांकृत्यायन।

जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती। – माधव राव सप्रे।

हिंदी विश्व की महान भाषा है। – राहुल सांकृत्यायन।

राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है। – ब्रजनंदन सहाय।

जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो। – संत रामदास।

पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती। – माखनलाल चतुर्वेदी।

मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा। – लीलावती मुंशी।

हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए। – देवी प्रसाद गुप्त।

साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है। – पं. वागीश्वर जी।

हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। – डॉ. राजेंद्रप्रसाद।

हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। – सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है। – पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। – सुभाषचंद्र बसु।

पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है। – पं. वागीश्वर जी।

विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है। – बी. सी. जोशी।

हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। – माखनलाल चतुर्वेदी।

यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे। – बृजनंदन सहाय।

भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है। – म. म. रामावतार शर्मा।

साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है। – रघुवरप्रसाद द्विवेदी।

यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें। – एक फ्रांसीसी बालिका।

निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है। – पंडित सुधाकर पांडेय।

हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। – सैयद अमीर अली मीर।

इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है। – जयचंद्र विद्यालंकार।

सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है। – अमरनाथ झा।

{ संकलन सहयोग : दिनेश सरोज }

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