सीने मे जलन आँखों मे तूफान सा क्यों है.
इस शहर मे हर शख़्स परेशान सा क्यों है
क्या कोई नयी बात नज़र आती है हममे
आईना हमे देख के परेशान सा क्यों है .
इन अशआर और ऐसे ही चुभते हुए अशआर को अपने मे समेटे हुए तमाम ग़ज़लों केग़ज़लकार ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित शहरयार जी हमारे बीच नही रहे. शहरयार जी कानाम किसी परिचय का मोहताज नही. वे ऐसे शायर हैं जो फिल्म और अदब – दोनो जगहजाने जाते हैं और जिन्होने फिल्मों के लिये लिखकर भी स्तर से समझौता नही किया औरबेहतरीन शायरी दी. उनकी फिल्मों के लिये कही ग़ज़लें इतनी आसान रहीं कि आम आदमीकी ज़्बान पर चढ़ गयीं और आज तक चढ़ीं हैं. उमराव जान की ग़जलें ( ‘ ज़िन्दगी जब भीतेरी वज़्म मे लाती है हमे ‘ या ‘ इन आँखों की मस्ती के पैमाने हज़ारों हैं ‘ … वगैरह )मुज्जफर अली की तमाम फिल्मों गमन, जूनी, अन्जुमन, दामन वगैरह – बनी और डिब्बाबंददोनो मे तकरीबन चालीस गीत/ ग़ज़लें लिखीं. कुछ लोकप्रिय ग़ज़लें जैसे गमन की… ” सीने मेजलन…” और उमराव जान की …” जुस्तजू जिसकी थी…” पहले कही गयीं थीं जिनको फिल्ममे लिया गया और वे कथानक के साथ ऐसे सटीक बैठीं जैसे कि उन्ही के लिये कही गयीं थीं.
ये तो रही बात उनकी लोकप्रियता की मगर “शहरयार” तखल्लुस फरमाने वाले कुंवरअख़लाक़ मुहम्मद खान साहित्यिक/ गम्भीर शायरी के भी शहरयार ( शाहजादा ) थे. वे 76वर्ष की आयु ( जन्म 16 जून 1936 को आंवला, बरेली मे व निधन 13 फरवरी 2012 कोअलीगढ़ मे ) हमे छोड़ कर यादों की दुनिया मे चले गये. वे बहुत दिनों से फेफड़े के कैंसर सेपीड़ित थे और पिछले एक हफ्ते से उन्हे बोलने मे भी दिक्कत हो रही थी.
वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्द्यालय मे पढ़े और वहीं उर्दू विभाग के प्रवक्ता रहे. उनकी तमामकिताबें हैं ( उर्दू मे – इस्म-ए-आज़म,सातवां दर, हिज़्र के मौसम, ख्वाब का दर बंद है, नींद कीकिरचें, शाम होने वाली है वगैरह, हिन्दी मे – मेरे हिस्से की ज़मीन, सैर-ए-जहां, मिलता रहूंगाख्वाब मे और अंग्रेजी मे अनुवादित – The Gateway of Dreams is Closed, Through the Closed doorway and Selected Poetry of Shaharyaar वगैरह ) और उन्हे विभिन्नकिताबों और समग्र रचना के लिये तमाम पुरस्कार व उपाधियां दी गयीं ( १९७१ मे उत्तर प्रदेशसाहित्य अकादमी सम्मान, १९८७ मे साहित्य अकादमी सम्मान, २०१० मे हैदरबादविश्वविद्द्यालय द्वारा मानद डी. लिट् और २०१० मे २००८ का ज्ञानपीठ पुरस्कार वगैरह.)
उनकी फिल्मी और लोकप्रिय शायरी की तो बहुत चर्चा है. यहां पर श्रद्धांजलि स्वरूप उनकीएक संजीदा नज़्म “शंख बजने की घड़ी ” प्रस्तुत कर रहा हूँ जो एक पुरातन हिंदू मान्यता (गाय के सींग पर टिकी पृथ्वी ) और हालात को बयां कर रही है -
शंख बजने की घड़ी
आँख मन्दिर के कलश पर रखो
शंख बजने की घड़ी आ पहुँची
देवदासी के कदम रुक- रुककर
आगे बढ़ते हैं
जमीं के नीचे
गाय को सींग बदलने की बड़ी जल्दी है
बुल हवस आखों ने फिर जाल बुना
खून टपकाती जबाँ फिर से हुई मसरुफे-सफर
साधना भंगना हो अबके भी
जोर से चीख के श्लोक
पुजारी ने पढ़े
आँख मन्दिर के कलश पर रक्खो

