Uncategorized|2010/02/04 9:41 pm

साहित्य अपने समय और समाज का साक्ष्य होता है:चित्रा मुद्गल

प्रश्न उठना स्वाभाविक है सर्वाधिक सक्रिय, बहुआयामी, बहुवर्णीय, समृद्ध, समकालीन रचना- परिदृश्य के बावजूद हमें यह आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है कि साहित्य के दायित्व को स्मरण किया-कराया जाये और उसकी विस्मृति के सप्रयास या अप्रयास कारणों की पड़ताल की जाये? वैसे इस चर्चा की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाया जा सकता है और कहा जा सकता है कि साहित्य के प्रवाह को उसके की स्थितियों और परिस्थितियों के भरोसे छोड़ दिया जाना चाहिए। सीमा और परिभाषा में बांधना उसके स्वमेव विकास को अंकुशीत करना है जो सर्वथा अनुचित है। तर्क यह भी है कि साहित्य के दायित्वच्युत होने की बात उन पुरातनपंथी साहित्यकारों की दुष्चिंताएं हैं जो बदले हुए समय की करवटों को छू सकने में असमर्थ हैं और तेजी से परिवर्तित हो रही जीवनशैली और उसके दैहिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक दबावों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें लग रहा है कि आधुनिकता से उत्तर-आधुनिकता की ओर पींगे बढ़ा रहा, अपनी परम्पराओं से विच्छिन्न वर्तमान भारतीय सामाजिक परिदृश्य, मानवीय रिश्तो की धूमिल हो रही गरिमा के प्रति असंवेदनशील हो, अपनी सोच व आचरण में नितांत व्यक्तिवादी और उपभोक्तावादी होता चला जा रहा है, साहित्य उसे अपेक्षित दिशा-दृष्टि नहीं दे रहा! परिणामस्वरूप जीवन-मूल्य व नैतिकता के प्रति नयी पीढ़ी की घटती आस्था, वर्तमान समाज के सबसे बड़े संकट के रूप में उभर रही है। आपत्ति यह भी है कि साहित्य की स्वायत्तता सर्वोपरि है। उसमें हस्तक्षेप की कल्पना नहीं की जा सकती।
किंतु इस तथ्य से निरपेक्ष भी नहीं हुआ जा सकता कि समय-समय पर होनेवाले साहित्यिक आंदोलनों ने साहित्य की दशा-दिशा में हस्तक्षेप कर उसे उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता का स्मरण करवाया है और समाज के हासिये पर पड़े उन दलितों-शोषितों की पैरवी कर उसे अपना प्रमुख मुद्दा बनाने के लिए और उनके संघर्ष को अपना लक्ष्य-संघर्ष मनवाने के लिए बाध्य किया है- जो कुछ लिखा जा रहा है- वह जरूरी हो सकता है, मगर अन्य जरूरी मुद्दे भी हैं जिनसे आंखें चुराना सामाजिक प्रतिबद्धता से मुंह मोड़ना होगा।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने बरसों पहले साहित्य को परिभाषित किया था- साहित्य समाज का दर्पण है। दर्पण में वही प्रतिबिम्बित होता है जो समाज में है। तलछट का नग्न सत्य, समाज का वह नग्न सत्य, जिससे साहित्य का सुधी पाठक अनभिज्ञ था, जानता भी था तो उन दलितों-शोषितों के उन नारकीय घावों की चिलकन से सर्वथा अपरिचित था जिन्हें उसके सामंतवादी मानसिक अनुकूलन ने कभी देखने और महसूस करने ही नहीं दिया। उसकी रूढ़ संवेदना ने समाज के इन तिरस्कृत उपेक्षितों की अमानवीय स्थितियों के लिए कभी स्वयं को जिम्मेदार माना ही नहीं। माना तो सिर्फ यही कि यह उसकी नियति है। जातीय नियति और वह अपनी नियति भोग रहे हैं। उनकी नियति तो उनकी सेवा करना है। क्योंकि सत्ता की बागडोर उनके हाथों की मैल है।
साहित्य के दर्पण में प्रतिबिम्बित सामाजिक हासिये के इस क्रूर भयावह यथार्थ साहित्य के सुधी पाठकों की रूढ़ संवेदना को निष्चय ही रूढ़पे से मुक्त किया। कुछ कीलें उनके मर्म पर ठुकीं। वे गुनाहगार हैं। घृणा और तिरस्कार किसी सीमा तक तिरोहित हुए। किंतु हासिये पर टिके लोगों का सत्य जानना और जतलाना भर साहित्य का उद्देश्य नहीं है। साहित्य का उद्देश्य उन्हें उस हासीये से बाहर निकाल समाज की मुख्य धारा में लाना भी है। पाठकों का मन केवल पसीजे ही नहीं, उन्हें बाहर निकालने के लिए प्रवृत्त भी हो। हजारीप्रसाद द्विवेदी से पूर्व प्रेमचंद ने साहित्य के इसी ‘एक्टिविज्म’ की ओर खुलकर संकेत करते हुए साहित्य के दायित्व को इन शब्दों में परिभाषित किया- ‘साहित्य राजनीति के आगे चलनेवाली मशाल है’। मशाल की जरूरत तभी होती है जब अंधेरे से मुनष्य को लड़ना होता है। लड़कर उसे दूर भगाना होता है। दूर भगाये बगैर अंधेरे को खत्म नहीं किया जा सकता। अंधेरा चाहे मनुष्य के अंतर्मन की तहों में दुबका उसकी कुंठाओं स्वार्थों और वासनाओं का हो या आम आदमी के बुनियादी अधिकारों को डकार उन्हें रोशनी के कतरों से वंचित रखनेवाली व्यवस्था का हो- साहित्य का दायित्व है कि उसकी प्रतिबद्धता भटकों और वंचितों के हक में खड़ी दृष्टिगत हो। क्योंकि रोशनी पर उनका भी अधिकार है। रोषनी यानी सामाजिक विकास में उनकी मुकम्मल सहभागिता, सुख, समृद्धि और उज्जवल भविष्य में उनकी वर्तमान पीढ़ी ही नहीं, आनेवाली पीढ़ी भी बराबर की हिस्सेदारी हो। साहित्य का दायित्व रचनाओं के माध्यम से पाठकों को उपदेश देना हरगिज नहीं है। बल्कि वह गुंजाइश बनाना है जो उनकी जड़ संवेदना को जगाकर उनकी चेतना को सही दिशा में सोचने और सक्रिय होने के लिए प्रेरित करे।
लेकिन यह समकालीन रचना-परिदृश्य साहित्य की लगभग सभी विधाओं में गहरी संलग्नता के साथ प्रचुर लेखन के बावजूद, कतिपय अपवादों को छोड़कर, सही मायने में अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति ईमानदारी से प्रतिबद्ध है? या सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध होने की बात करना उसकी विचारधारात्मक प्रतिबद्धता की मजबूरी है, जो उनके साहित्य में सिरे से खारिज नजऱ आती है?
जिस संक्रमण काल से वर्तमान भारतीय समाज दो-चार हो रहा है, वहां उसका विघटन के कई-कई कुरूप चेहरे आभासित हो रहे हैं। सच कहें तो भूमंडलीकरण और उदारीकरण के इस बाजारवादी दौर में जहां पूरी दुनिया एक विश्व-गांव के मुगालते में जीने को अभिशप्त हो रही है और हम तकनीकी उपलब्धियों को चकाचैंध से चैंधियाये अपने सांस्कृतिक और पारिवारिक मजबूत ढांचे को ध्वस्त होता हुआ देखकर भी यह कहकर स्वयं को आश्वस्त कर रहे हैं कि इस संस्कृतिक संक्रमण का शिकार केवल हम ही नहीं हो रहे हैं, तो ऐसे साहित्यकारों से पूछना जरूरी लगने लगा है कि मूल्यों के एवज में अवमूल्यों की पैरवी और पक्षधरता किस साहित्यिक एक्टिविज्म की द्योतक है। बाजार की धूर्तताओं का अन्वेषण और संधान उनकी प्रतिबद्ध कलम क्यों नहीं कर पा रही? देश की प्रतिभाओं का रोजगार के अभाव में विदेशी में पलायन छोटी बात हैं? जिन डाक्टरों और इंजीनियरों की प्रतिभा और क्षमता का उपयोग हमारे अविकसित गांव-देहातों में होना था वह हमारी होकर भी हमारे लिए उपलब्ध नहीं है। यह पक्ष हमारे साहित्य की चिंता का विषय क्यों न हो?
सर्वविदित सत्य है कि केमिकल और इस्पात की प्रगति जनसामान्य के जीवन को सुख-सुविधाओं से तो पाट सकती है किंतु वह उनके पेट की रोटी नहीं बन सकती। विचारणीय मुद्दा है कि जिस संक्रमण काल से वर्तमान भारतीय समाज दो-चार हो सहा है, वहां उसके विघटन और मानवीय मूल्यों के हृास के कई-कई कुरूप चेहरे आभासित हो रहे हैं। साहित्य उन विडम्बनाओं और विसंगतियों की आहटों को क्यों नहीं महसूस कर रहा? विचलित क्यों नहीं हो रहा?
शिवमूर्ति जैसे उपन्यासकार भी हैं जो हमारे समय की आहटों को समझने में लगे हैं, लेकिन इसके बरक्स जब राजेन्द्र यादव जैसे प्रतिष्ठित रचनाकार-सम्पादक एक ग्रामीण विशेष कलमकार की केलि कथाओं को स्त्री-विमर्श के नाम पर उछालने और स्थापित करने में लगे हुए यह साबित करने का प्रयास करते दिखते हैं कि योनि-स्वतंत्रता और स्वच्छंदता की आकंक्षी ग्रामीण-स्त्री पढ़ी, लिखी और शहरी स्वावल्बित स्त्रियों की निर्भीक है तो सवालिया निशान लगने उनकी कहानी ‘नया फ्लैट’ आखिर कि सामाजिक सरोकारों की पैरवी का आगाज है? अपनी बुड़मस काम-कुंठाओं को जनवाद के नाम पर परोसना और नये रचनाकारों को वैसा ही लिखने के लिए आकृष्ट करना भूमंडलीकरण, उदारीकरण और बाजारवाद के भयानक उपभोक्तावादी स्वरूप से उपजी त्रासदियों की ओर से मुंह मोड़ने के लिए बाध्य करना नहीं है?
साहित्य अपने समय और समाज का साक्ष्य होता है, वह साक्ष्य जो उसे अपनी चेतना के आलोक में झांकने के लिए विवश ही नहीं करता, उसे स्वयं से मुठभेड़ करने और अपने जैसों के उपर होनेवाले अन्यायों के खिलाफ एकजुट होने के लिए भी प्रेरित करता हैं, इसलिए उसे सृजन कहा जाता है, वह ध्वस्त खंडहरों को नयी इमारतों में बदलने की क्षमता रखता है। सवाल यह है कि कितने इस बात को समझ रहे हैं और कितना समझते हैं?

  • Share this post:
  • Facebook
  • Twitter
  • Delicious
  • Digg

Leave a Reply