इतिहास के अंधेरों में खोई हुई यह एक सच्चाई है कि भारत के वनवासी अंग्रेजों के भारत में आने से बहुत पहले विशालकाय अग्निबाणों का प्रयोग करते थे। स्वयं अंग्रेजों ने इसके बारे में लिखा है। संथालों ने अंग्रेजों के विरुद्ध1857 से पहले से चल रहे अनेक युद्धों में इन अग्नि बाणों का प्रयोग किया। लगभग 15 हजार संथालों का बलिदान वर्षों चले इस संघर्ष में हुआ था।
1857 की लड़ाई में इन ‘बाणों’ का प्रयोग हुआ। अंग्रेज इनसे बड़े भयभीत और आश्चर्यचकित थे। ये बाण जहां भी गिरते थे वहां बड़ा विनाश होता था। कई प्रकार के यंत्रों वाले ये अग्निबाण अनेक प्रकार और अलग-अलग प्रभावों वाले बने हुए थे। सन् 1766 में श्री रंगपट्टम के युद्ध में भी टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरूद्ध इनका प्रयोग किया था।
इस युद्ध में अंग्रेजों की सेना में एक अंग्रेज हवलदार ‘कोनग्रीव सुवाल्टन’ था। लगता है कि उसने इन अग्नी वर्षा करने वाले भयानक बाणों की तकनीक का बारकी से अध्ययन किया। अंग्रेजों ने बड़ी मेहनत और कौशल से इस यु( के 40 साल बाद सन् 1806 में जो राकेट बनाया उसका नाम ‘‘कोनग्रीव-रॉकेट’’ रखा।
अंग्रेजों द्वारा लिखे साक्ष्यों से दो बाते स्पष्ट होती हैं। पहली यह कि भारत में यह बाण विद्या अत्यन्त प्राचीनकाल से प्रचलित थी। दूसरा यह कि ब्रितानियों ने भारत से सीखकर इन अस्त्रों का विकास किया जो राॅकेट के नाम से जाने गए। प्राप्त प्रणामों में से कुछ ये हैं।
‘‘यह रॉकेट केवल मैसूर की ही विलक्षणता नहीं थे वरना उससे पूर्व सभी युगों में पूरे हिन्दुस्तान में प्रचलित थे।’’
-विलियम इरविन की पुस्तक पृ.-166
विदेशी धन के दम पर पलते भारत के विरोधी
केन्द्र सरकार ने माना है कि दारुल उलूम और देवबन्द तथा सम्बद्ध संस्थाओं को खाड़ी देशों से सन् 2006 में 40 करोड़ रुपया मिला था जिसके प्रमाण हैं। मदरसों और मस्जिदों को तीन हजार करोड़ हर साल मिल रहा है।
इसाई संगठनों को सन् 2005-06 में 108.6 करोड़ रुपऐ अमेरीका से, 662 करोड़ ब्रिटेन से, 650 करोड़ जर्मनी से, 261 करोड़ इटली से, 224 करोड़ रुपये नीदर लैण्ड से मिले थे।

