मानव जीवन में धर्म, अर्थ और काम की भूमिका अहम भी है और अत्यन्त महत्वपूर्ण भी। काम यद्यपि सर्वाधिक शक्तिशाली प्रवृत्ति है, फिर भी धर्म और अर्थ के महत्व को न तो नज़रअंदाज़ किया जा सकता है और ही नकारा जा सकता है। जीवन के अस्तित्व, विकास एवं समृद्धि के लिए केवल भौतिक वरन् आध्यात्मिक प्रगति के लिए यह त्रिवेणी आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। हमारे प्राचीन मनीषियों और महार्षियों ने धर्म, अर्थ और काम को समान महत्व दिया है। इसी तिपाही पर जीवन का सन्तुलन बना रहता है अन्यथा किसी पक्ष को अधिक महत्व देने से सन्तुलन डगमगा जाएगा- आनन्द का पुष्प मुरझा जाएगा।
पूर्व मनीषियों के समान महर्षि वात्स्यायन ने भी सर्वप्रथम स्थान दिया है धर्म को। धर्म के अभाव में काम बिदक जाता है, भटक जाता है। धर्म के प्रति जो आम धारणा है वह वास्तविक नहीं है। भजन, पूजन और पाखंड धर्म का पर्याय बन चुके हैं। केवल पूजा पाठ कर लेना एवं आडम्बर का प्रदर्शन करना ही धर्म नहीं है। धर्म का अर्थ है धारण करना। प्रश्न उठता है, क्या धारण करना है। सदगुणों को अपनाना, नैतिक मूल्यों का ध्यानपूर्वक पालन करना तथा अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करना ही मानव धर्म है। प्रायः हर धर्म ने नैतिक मूल्यों का प्रतिपादन किया है। भगवान कृष्ण के अनुसार कर्म अर्थात कर्त्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही धर्म है। महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा है- कर्त्तव्य का ही दूसरा नाम धर्म है। कर्म क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है। प्रत्येक आयु समूह के व्यक्तियों तथा समुदायों के कर्त्तव्यों में भिन्नता हो सकती है, पर नैतिक मूल्य तो अपरिवर्तित ही रहेंगे।
विद्यार्थी का कर्त्तव्य है निष्ठापूर्वक अध्ययन करना, अध्यापक का कर्त्तव्य है अपने ज्ञान के द्वीप से बालमों में का द्वीप प्रज्वलित करना। पति का कर्त्तव्य है पत्नि के प्रति निष्ठावान रहते हुए सन्तान का पालन पोषण करना तथा उनकी शिक्षा-दीक्षा की समुचित व्यवस्था करना। इसी तरह हर क्षेत्र में अपने अपने कार्य एवं व्यवसाय में संलग्न व्यक्ति को अपने कार्य का सम्पासन नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए निष्ठापूर्वक करना है।
धर्म के समान ही जीवन में अर्थ की भूमिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आज के भटतिक युग में तो अर्थ की महिमा ही सर्वोपरि हो गई है। आज तो जैसे समस्त जीवन ही अर्थ केन्द्रित हो गया है। अर्थ और काम को ही वर्तमान में सर्वाधिक महत्व दिया जा रहा है- धर्म अर्थात नैतिक मूल्यों को ताक पर रख दिया गया हैः इसीलिए आज का मानव जीवन असंतुलित होकर डगमगा गया है, भटक गया है। सर्व सम्पन्न होने पर भी आज मानव भीतर से खोखला, अशांत एवं पीड़ित है। अर्थ का वास्तविक प्रयोजन है स्वस्थ सुखी जीवन के लिए आवश्यक धनोपार्जन करना। धन के अभाव में जीना दूभर हो जाएगा। हर कदम पर धन की आवश्यक्ता होती है। धन का अर्थ केवल मुद्रा या सोना-चाँदी ही नहीं होता। विद्या, भूमि, मकान, अन्न, पशु आदि सभी धन ही हैं तथा अर्थ के अन्तर्गत आते हैं। भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा, यात्रा, व्यवसाय, उद्योग सभी के लिए धन की आवश्यक्ता होती है। भूखे पेट न तो भजन हो सकता है और न ही कर्त्तव्य का निर्वाह। जीवन की गाड़ी धन के अभाव में एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकती। इसलिए हमारे दिव्य दृष्टा महर्षियों ने धन के महत्व को स्वीकारा तथा धर्म के बाद उसे ही द्वितीय स्थान दिया है। धर्माश्रित अर्थ ही जीवन में सुख शान्ति का संचार कर सकता है।
आर्थिक उपलब्धि के लिए धैर्य, प्रयत्न और पुरुषार्थ की आवश्यक्ता होती है। जो उद्धमी और परिश्रमी नहीं होता, उसकी आर्थिक स्थिति दयनीय होती है। वह स्वयं पीड़ित रहता है, साथ ही अपने परिवार को अभाव की अग्नि में झोंक देता है। संघर्ष ही जीवन है। जो संघर्ष से कतराता है वह आलसी और निकम्मा हो जाता है। निकम्मे व्यक्ति ही अपराध की ओर अग्रसर होकर सामाजिक सुख-शांति में व्यवधान उत्पन्न करते हैं। लगनपूर्वक किया गया कठोर परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता। पुरुषार्थी का मूल-मन्त्र होता है- श्रमेव जयते!
अकल्पित, अद्भुत, अलौकिक आनन्द का आदिम स्त्रोत, मूल उद्गम, निर्विवाद रूप से काम है। जीवन की प्रेरक शक्ति, गतिशीलता, नर नारी के परस्पर आकर्षण, द्वैत भआव को विस्मृत कर एक प्राण, एक रस हो जाने की अदम्य लालसा का ही नाम काम है। काम के चरम बिंदु पर पहुँचने पर अलौकिक आनन्द के अद्भुत क्षणों में जब नर-नारी एकाकार हो जाते हैं, तब नए जीवन का अंकुरण होता है, नए प्राणी का उद्भव और विकास होता है। मानव के अस्तित्व का यही रहस्य है।
प्राचीन ऋषियों की भांति महर्षि वात्सयायन ने भी काम की रहस्यमय शक्ति का वैज्ञानिक विवेचन करते हुए उसे जीवन को आनन्द और उल्लास से परिपूर्ण बनाने के लिए एक व्यवहारिक रूप प्रदान किया है। उन्होंने काम को वासना-पूर्ति का एक साधन मात्र न मानकर रचनात्मक एवं प्रेरक शक्ति का स्वरूप प्रदान किया है। न केवल मानव जीवन वरन समस्त मैथुनिक जगत का केन्द्र बिन्दु काम ही है। यही समस्त जीवन का केन्द्रक (nucleus) है- नर और नारी इसी के गिर्द प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन के रूप में परिभ्रमण करते रहते हैं। काम ही स्त्री और पुरुष में परस्पर आकर्षण और सम्मोहन उत्पन्न करता है- एक दूसरे में समा जाने के लिए, घुल मिल जाने के लिए दो शरीर एक प्राण हो जाने के लिए प्रेरित करता है। यदि काम न हो तो जीवन की उत्पत्ति न हो। स्त्री की शक्ति ऋणात्मक तथा पुरुष की शक्ति धनात्मक होती है। इन्हीं दोनों शक्तियों का संयोजन काम के द्वारा होता है और एक नए जीवन की उत्पत्ति होती है।
यदि विधाता ने काम शक्ति का सृजन नहीं किया होता तो धरती वीरान पड़ी होती। मनुष्य तो क्या कीट-पतंगे भी दृष्टिगोचर न होते। शैव दर्शन के अनुसार शिव और शक्ति के पारस्परिक संयोजन से ही समस्त सृष्टि का उद्भव हुआ है। शिव पुराण की यही मान्यता है कि ब्राह्मांड की उत्पत्ति शक्ति और शक्तिमान से हुई; इसे ही शैव और शक्ति कहा जाता है। जिसे वासना अथवा काम-ज्वार कहा जाता है, वह और कुछ नहीं प्रकृति और पुरुष के परस्पर आकर्षण और मिलन का मूलभूत आधार है। सृष्टा ने मानव को चौदह मूल प्रवृत्तियों से विभूषित किया है। इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली प्रवृत्ति काम है और कामुकता उसका प्रचंड संवेग है, एक ऐसा संवेग, एक ऐसा प्रबल प्रवाह जिसमें बड़े बड़े संयमी, आदर्शवादी, बड़े बड़े योगी और तपस्वी क्षण मात्र में तिनके के समान बह जाते हैं। हमारे पुराणों में ऐसे प्रकरणों एवं उदाहरणों की भरमार है।
यथार्थ में काम का क्षेत्र अत्यन्त विशाल एवं व्यापक है। आमतौर पर काम का अर्थ लिया जाता है स्त्री-पुरुष का परस्पर लैंगिक सम्पर्क एवं शारीरिक आवश्यक्ता की पू्ति तथा कामाग्नि की शांति। पर यह अर्थ अत्यन्त संकीर्ण भी है और एकांगी भी। काम की शक्ति अपरिमित है। वह भोग-विलास का साधन मात्र ही नहीं, अध्यात्म की ऊँचाईयों को स्पर्श करने का एक सशक्त माध्यम भी है। काम की तुल्ना एक अनियंत्रित, अत्यन्त वेगवति पहाड़ी नदी से की जा सकती है। पहाड़ी नदी में जब बाढ़ का प्रकोप होता है तो वह किनारे तोड़कर गाँवों तथा खड़ी फ़सलों को नष्ट कर भयानक तबाही मचा देती है, कईयों की जानें भी चली जाती हैं। पर यदि पहाड़ी नदी के प्रवाह को बड़ी छोटी नहरों की ओर मोड़ दिया जाए तो बंजर भूमि भी लहलहाने लगती है और जन जीवन में खुशियों की बहार छा जाती है। इसे ही मनोविज्ञान की भाषा में काम प्रवृत्ति का मार्गान्तरीकरण कहा जाता है। कामशक्ति को इससे भी अधिक परिष्कृत किया जा सकता है। उसी पहाड़ी नदी का जल जब वाष्प में परिवर्तित कर दिया जाता है तो बड़े बड़े इंजन उसी की ऊर्जा से लम्बी रेलगाड़ी को तीव्र गति से खींच सकते हैं। इसी प्रकार कामशक्ति का जब कल्याणकारी उपयोग किया जाता है तब उच्चकोटि की ललित कलाओं का विकास होता है। नृत्य, संगीत, चित्रकला, साहित्य रचना में कामशक्ति की ही मनोहारी छटा परिलक्षित होती है। इसे ही कामशक्ति का उद्दातीकरण (sublimation) कहा जाता है। कामशक्ति का ही सर्वोच्च स्वरूप योग है, समाधि है। संभोग जन्य क्षणिक आनन्द को स्थायी ब्रह्मानन्द में परिवर्तित कर देना ही योग का परम लक्षय है।
महर्षि वात्सयायन ने स्वयं काम की जो व्याख्या की है, वह अत्यन्त हृदयग्राही है। वे कहते हैं- पंचेन्द्रियों द्वारा वांछित वस्तु से आनन्द की जो अनुभूति होती है और मन तथा आत्मा को जिस तृप्ति का अनुभव होता है, वही काम है। केवल रति क्रीड़ा में पांचों इंद्रियां एक साथ सक्रिय होती हैं- स्पर्श, आलिंगन, चुम्बन, संभाषण, सभी की अहम भूमिका होती है संभोगकाल में। आलिंगन, चुम्बन, घर्षण एवं रति क्रीड़ा का सम्बन्ध स्पर्श सुख अर्थात त्वचा से है। प्रेमिका की हंसी, सीत्कार सम्बोधन, उदगार का सम्बन्ध श्रवण अर्थात कान से है। प्रेमिका के चन्द्र मुख को देखना, उसके कामनीय अंगों तथा योनि के दर्शन मात्र से कामोत्तेजित हो जाना नेत्र सुख है। प्रेमिका के अधरों तथा जिह्वा का रसापान जिह्वा का कार्य है। प्रेमिका के मुख, शरीर एवं स्वस्थ योनि की प्राकृतिक कामोत्तेजक गंध से नासिका तृप्त हो जाती है। केवल रति क्रीड़ा के समय ही समस्त पंचेन्द्रियां एक साथ जागृत एवं सक्रिय होती हैं। किसी अन्य अवसर पर ऐसा नहीं होता। इन पांचों इन्द्रियों के तालमेल एवं क्रियाशीलता से रति जन्य आनन्द की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है एवं चरमोत्कर्ष के समय जिस अलौकिक आनन्द की अनुभूति प्रेमी युगल को होती है, वह कल्पनातीत है, वर्णनातीत है। मनीषियों ने इसी लिए कामानन्द को ब्रह्मानन्द का ही रूप माना है, अंतर है तो केवल इतना कि कामानन्द केवल चन्द्र क्षणों तक सीमित रहता है परन्तु ब्रह्मानन्द अथवा दिव्यानन्द स्थायी होता है।, अनन्त होता है।
जीवन में काम की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होने पर भी उसका सीमा से अधिक सेवन अवांछनीय भी है और घातक भी। इसी लिए महर्षि वात्स्यायन ने धर्म, अर्थ और काम को समान महत्व दिया है, तीनों के तालमेल एवं संतुलन से ही जीवन में उल्लास एवं सुख-शांति का संचार हो सकता है। आयुर्वेद की मान्यता के अनुसार स्वस्थ बने रहने के लिए शरीर में वात, पित्त और कफ में संतुलन बने रहना आवश्यक है। संतुलन में लेशमात्र भी उलट फेर होने से शरीर रोग ग्रस्त हो जाता है, स्वास्थय नष्ट हो जाता है। इसी तरह धर्म, अर्थ और काम में परस्पर संतुलन बने रहना मानसिक स्वास्थय एवं सुखी जीवन के लिए परमावश्यक है। इन तीनों में संतुलन बनाए रखने के लिए ही वैदिक ऋषियों ने गृहस्थाश्रम का महत्व प्रतिपादित किया है। इनका समुचित तालमेल ही मानसिक और शारीरिक स्वास्थय का मूल रहस्य है।


true is very importent in life.