Uncategorized|Shortlink: 2010/03/07 12:39 pm

बूंदों का विश्वासघात

मैं आस्तिक नहीं हूं न ही नास्तिक हूं। भगवान का अस्तित्व मेरे लिए सिर्फ मेरे डर को एक नया रूप देने का माध्यम है। मगर मैं भगवान को नहीं मानता, मगर उसके अस्तित्व को पूर्णतयाः नकार भी नहीं सकता हूं। भगवान है, क्यों है ? इसका जवाब भी मैं आपको दूंगा। मेरे लिए भगवान का अस्तित्व सिर्फ इसलिए है कि क्योंकि मुझे भी डर लगता है। कालेज के गेट के अंदर सभी का मानना है कि मुझमें भी कुछ बात है, मैं कुछ करूंगा। मगर मेरा मानना है कि नहीं, मैं कुछ नहीं, शायद कुछ भी नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मुझे डर लगता है। मगर दोस्तो अभी मैं आपको अपने डर से नहीं बल्कि इस डर से बचने के साधन के बारे में बताना चाहूंगा। ‘‘मां की गोद’’ यकीन कीजिए अगर आपके पास यह साधन है तो दुनिया में कोई भी डर आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इस दुनिया के बहुत सारे रंगों को मैंने बड़े नजदीक से देखा है, इसलिए मेरी बात पर यकीन कीजिए। अक्खी मुंबई पर राज करने वाले ‘‘वास्तव’’ के रघु भाई को जब ज़िंदगी में पहली बार डर लगा तो वो अपनी मां के गोद में जाकर छिप गये थे। रघु भाई ही क्यों, मुन्ना भाई M.B.B.S. भी तो अपनी मां की जादू की झप्पी के मिलते ही उनका डर चला जाता है। जब दिल्ली की चौड़ी सड़के, लम्बी-लम्बी और बड़ी-बड़ी गाडियां, ऊंचे-ऊचे बंगले और उन बंगलों के गेट के अंदर से झांकने वाले कुत्ते जब मुझे डरा देते है तो मुझे भी अपनी मां की याद आ जाती है। क्योंकि मेरी मां मेरे साथ नहीं रहती है, इसलिए मैं दुर्गा मां के पास चला जाता हूं। हालांकि वो मुझसे कुछ बोलती नहीं है न ही वो मुझे मेरी मां की तरह अपनी गोद में सुलाती है पर न जाने क्यों मुझे वो मेरी मां की तरह लगती है, इसलिए मैं उनके घर (मंदिर) पर चला जाता हूं। मैं उन्हें कोई भगवान मानकर उनके पास नहीं जाता हूं मैं तो उन्हें बस अपनी दूसरी मां मानता हूं इसलिये उनके पास चला जाता हूं। मेरे अपनों के सपनों का बोझ उठाये हुए मेरे ये पतले कंधे जब 4-6 महीनों में थक जाते हैं जो मुझे मेरी मां की याद आ जाती है और मैं उसके पास जाने की तैयारियां करने लगता हूं। जैसे:- कपड़े खरीदना, बाल कटवाना आदि। मैंने कभी इस बात को कभी स्वीकार नहीं किया है कि मुझे भी डर लगता है। इसलिए इन पन्नों पर अपनी स्वीकार करके मैं अपने मन को हल्का करने की कोशिश कर रहा हूँ। मन्नू भंडारी लिखित एक पुस्तक ‘‘आपका बंटी’’ पढ़ा था। उस वक्त मेरे आंखों से पानी की तीन-चार बूंदे गिरी थी। उन बूदों ने मुझसे विश्वासघात किया था और वो मेरे आज्ञा के बिना ही मेरे आँखों से बाहर आ गयी थी। इसकी सज़ा मैंने मुक्करर कर दी है। मैं उस पुस्तक को दुबारा पढुंगा और अपने आसुओं द्वारा किये गये विश्वासघात का बदला लूंगा मैं इस बार अपने अस्तित्व का नियंत्रण अपने दिमाग को दे दूंगा जिससे मेरी भावनायें मुझ पर हावी न हो सके। और मैं रोना चाहते हुए भी न रो सकूँ। अगर मैं स्वयं को नहीं रोक पाया तो मैं खुद को यह सजा उतनी बार दुंगा जब तक कि मैं अपनी सजा को सही मायनों में पूरा न सकूं। बंटी से मेरा एक अनाम रिश्ता बन गया है, मगर मैं उसके लिए सहानूभूति नहीं प्रकट कर सकता हूं, क्योंकि मुझे भी उसी सज़ा के लिए चुना गया जिस सजा के लिए बंटी को चुना गया था। बंटी से उसके मां की गोद को छिन लिया गया था और मुझसे भी मेरी मां की गोद को छिन लिया गया है। हालांकि दोनों के कारण अलग-अलग है मगर परिणाम एक है। मैं बंटी को यह तो कह सकता हूं कि मैं तुम्हारे दुःख को महसूस कर सकता हूं मगर उसके लिए सहानूभूति नहीं प्रकट कर सकता हूँ।

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