बसंत पर ग्रहण का साया!

खुशियों का रंग लेके बसंत,
 आया… बसंत आया

यह शाश्वत कहानी,
लगने लगी बेमानी,
हुआ समय का फेरा,
आतंकियों ने घेरा,

कर अतिक्रमण,
सीमा को दे चुनौती,
सबल दानवता,
मानवता रोती.

बन मानवबम्ब,
बसंत पर ग्रहण
बदरंगी धुंधलका छाया.

आया बसंत आया

बिकीं आत्माएँ,
मिटी आस्थाएं,
अत्याचार का चोला,
अनाचार बढ़बोला,

सब कलुष कलुष,
आतंक फलित.
सब ओर है डर,
कुछ भी न स्थिर.

अबकी बसंती मेला
मैला विषैला हो आया! …आया बसंत आया

चोरी धमार,
है बेमुशार,
कहीं आगजनी,
तो भूखजनी,

शिशु, कन्यायों की

उठाई गिरी,

आतंकियों का घेरा,
चहुँ ओर है अँधेरा ,
कैसा बसंत आया!
बदरंग होके छाया… आया बसंत आया

उठ जाग युवक,
रण भेरी बजा,
ले पकड़ खडग,
अब बन कर्मठ,
अन्याय मिटा,
पहन बासंती चोला,
है यही समय का बोला,

अन्याय का हो अंत,
वीरों का यही बसंत!
सब मिल कर कहें-
फिर से बसंत आया…आया बसंत आया.

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