प्रेस कौंसिल का नाम सुनते ही बस एक ही संस्थान दिमाग में आता है…भारतीय प्रेस परिषद अर्थात प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया. लोग इसे इसके संक्षिप्त नाम पी सी आई से भी जानते हैं. पर “प्रेस कौंसिल” शब्दों का दुरपयोग करके इस एतिहासिक और गौरवशाली संस्थान की बराबरी के निंदनीय प्रयासों का सिलसिला अब भी जारी है. मुझे याद है कि कुछ वर्ष पूर्व भी लुधियाना की एक्सटेंशन लाएब्रेरी में एक कार्यक्रम हुआ था जिसका आयोजन करने वाली संस्था ने “प्रेस कौंसिल” शब्द बड़े बड़े आकार में लिख कर अपने इस आयोजन का प्रचार किया था. उन दिनों मै पंजाब यूनियन आफ जर्नलिस्ट (पी यू जे) के साथ सरगरम था. मेरे साथिओं में अशोक सिंघी और डाक्टर एच एस लाल भी थे. श्याम खोसला, बलबीर पुंज और अशोक मलिक जैसे वरिष्ठ लोग नैशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (एन यू जे) में से हमें सहयोग भी करते थे और मार्गदर्शन भी. बदले हुए हालात में मीडिया कौंसिल बनाने की बात तो श्याम खोसला ने भी कही लेकिन कभी भी किसी ने प्रेस कौंसिल के समान को ठेस पहुँचाने या फिर उसकी बराबरी करने की बात न तो कभी सोची और न ही कभी की. लेकिन कुछ ऐसे लोग जो खुद को पत्रकार भी कहते हैं पर बातें वे इस तरह की कर रहे हैं जिनसे लगता है कि वे जाने या अनजाने में प्रेस कौंसिल की बराबरी करने का अनुचित, निंदनीय और नाकाम प्रयास भी कर रहे हैं और भूलवश या फिर गुमराह हो कर प्रेस कौंसिल के सम्मान को ठेस भी पहुंचा रहे हैं. इसकी चर्चा हिंदी ब्लोग जगत में भी हुई है. हमें यकीन है कि वे जान बूझ कर ऐसा कर ही नहीं सकते. जिस सभा के नाम पर वे अपनी इस तरह की सरगर्मियां चला रहे हैं उस सभा ने भी अपना नाम बदल लिया है और इसकी घोषणा भी बाकायदा की गयी है. इस लिए हमारा अपने इन दोस्तों से भी विनम्र निवेदन है कि वे भी सर्व स्वीकृत मुख्या धारा में लौट आयें. जिसका सम्मान देश की सरकार भी करती है, पूरे विश्व का मीडिया भी, देश की न्याय पालिका भी और देश की जनता भी..उसके साथ टकराव करने की भूल कभी भूल कर भी न करें. –रैक्टर कथूरिया




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