उ0प्र0 की राजधानी लखनउ से मात्र 60किमी दूर स्थित ग्राम्य पचघरा,तहसील फतेहपुर,जनपद बाराबंकी के किसानों की बेशकीमती उपजाउ भूमि का उपमण्डी स्थल के निर्माण हेतु किया गया मनमाना अधिग्रहण आजाद भारत में किसानों की बेबसी और नौकरशाहों के मनमानेपूर्ण रवैये का प्रत्यक्ष उदाहरण है।सार्वजनिक उद्देश्य की पूर्ति के नाम पर सरकारी भूमि,बंजर,निष्प्रयोज्य भूमि की उपलब्धता होने के बावजूद किन कारणों से और किसे लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से इस कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण किया गया था,यह न्यायिक जांच का विषय है।17फरवरी,2004 में जब धारा 4-1 की विज्ञप्ति जारी की गयी थी,तब उस समय भी फतेहपुर में सरकारी भूमि उपलब्ध थी और आज भी है।अभी चन्द माह पूर्व पचघरा भूमि अधिग्रहण विरोधी मोर्चा द्वारा उपमण्डी स्थल निर्माण के लिए सुझायी गई एक सरकारी भूमि गाटा संख्या 1776रकबा 5.384 लगभग का अधिग्रहण प्रशासन द्वारा स्टेडियम के हेतु किया गया।प्रशासन का इस गाटा संख्या 1776 का वर्ष 2010 में अधिग्रहण करना साफ इंगित करता है कि वर्ष 2004 में पचघरा के किसानों की उपजाउ भूमि के अधिग्रहण की पूरी प्रक्रिया गैरजरूरी,किसान हित विरोधी तथा मनमानी पूर्ण थी।
दरअसल महात्मा गाँधी के ग्राम्य स्वराज्य की कल्पना को पण्डित नेहरू के पाश्चात्य प्रेम व औद्योगीकरण के अतिरेक प्रेम की बलि आजादी के तत्काल बाद से चढ़ाना प्रारम्भ हो गया था।डा0राममनोहर लोहिया,चैधरी चरण सिंह किसानों के अधिकारों की बहाली व जीवन स्तर को उच्च करने के लिए अपने सम्पूर्ण जीवन काल में प्रयास करते रहे।डा0 लोहिया किसानों की भूमि के अधिग्रहण के सख्त विरोधी थे,तथा उनकी सोच थी कि भूमि सेना का गठन कर के बंजर भूमि को तोड़कर वो भूमि किसानों को कृषि कार्य हेतु दे दी जाये।आज भूमि अधिग्रहण अधिनियम,1894 के कारण भारत का किसान व कृषि भूमि संकट में है।पूरे देश में जमीनों के अधिग्रहण ने किसानों को आन्दोलन की राह पर चलने को मजबूर कर दिया है।उ0प्र0 में अलीगढ़,आगरा में चल रहे भूमि अधिग्रहण विरोधी आन्दोलन के समर्थन में आज की तारीख में सभी राजनैतिक दल खड़े हैं।
उ0प्र0 की सरकार का हालिया ऐलान कि उ0प्र0 में किसानों की कृषि योग्य भूमि बगैर किसानों की सहमति के नहीं ली जायेगी,परियोजनायें रद्द कर दी जायेंगी,एक स्वागत योग्य सराहनीय कदम है,बशर्ते यह अमल में भी लाया जाये।उ0प्र0 सरकार को पचघरा-फतेहपुर,बाराबंकी के किसानों की भूमि अधिग्रहण को भी रद्द करके किसानों की भूमि किसानों को वापस करते हुए भूमि राजस्व अभिलेखों में किसानों के नाम फिर से दर्ज करनी चाहिए।उ0प्र0 की सरकार के इस घोषणा से संघर्षरत् अपने तथाकथित किसान नेतृत्व के छल के शिकार बने,प्रशासनिक षड़यंत्र के मकड़जाल में फंसे पचघरा के किसानों के चेहरे उ0प्र0 सरकार के इस निर्णय से खिल गये हैं।

