यद्यपि ऐलोपैथी का एकछत्र साम्राज्य दुनियाभर के देशों पर नजर आता है पर इसका यह अर्थ बिल्कुल नही कि यह औषध सिद्धांत सही है। ‘दवा-लॉबी ’ का गढ़ माने जाने वाले अमेरीका की दशा इन दवाओं के कारण इतनी खराब है कि वहां के कई ईमानदार चिकित्सक इन्हें किसी महामारी से अधिक खतरनाक मानने लगे हैं।
विश्व प्रसिद्द स्वास्थ्य साईट “Mercola .com ” के अनुसार अमेरिका में 2,25,000 लोग हर साल ऐलोपैथिक चिकित्सा के कारण मर जाते हैं। दवाओं के बुरे प्रभाव को आजीवन भोगने वालों की गिनती इन मृतको से कहीं अधिक है। जब अमेरीका की यह दुर्दशा है तो दुनिया के अन्य देशों के कितने लोग इन दवाओं के बुरे प्रभावों का शिकार बनें और असाध्य कष्ट भोग रहें हैं, इसका अनुमान कठिन है। यह संख्या करोड़ो में हो सकती है।
डॉ जोसैफ मैरकोला द्वारा इस की विस्तृत और प्रमाणिक जानकारी दी गई है। बड़ी दवा कंपनियों पर ये आरोप लगते हैं कि ये शक्तिशाली दवा माफिया अपने हथकण्डों के दम पर दुनिया को अपनी घातक दवाएं खाने पर बाध्य कर रहा है।
प्रश्न यह है कि आखिर केवल ऐलोपैथी की दवाओं के ही इतने घातक प्रभाव क्यों होते हैं ? बीसीयों प्राचीन पद्धतियाँ संसार में प्रचलित हैं , उनमें से तो किसी की दवाएं बार-बार वापिस लेने या बन्द करने की, उनपर प्रतिबन्ध लगाने की कभी जरूरत नहीं पड़ी। जबकि ऐलोपैथिक दवा निर्माता हानिकारक दवाओं के घातक प्रभावों के ओरोपों के चलते कई बिलियन डालर जुर्माना अदा कर चुके हैं। वास्तव में एलोपेथी की दवाओं के निर्माण का सिद्धांत ही दोषपूर्ण है। इसे जानने समझाने से पूरा चित्र स्पष्ट हो जाता है ।
विषाक्तता का सिद्धांत :-
आयुर्वेद तथा सभी चिकित्सा पद्धतियों में मूल पदार्थों यथा फल, फूल, पत्ते, छाल, धातु, आदि को घोटने, पीसने, जलाने, मारने, शोधन, मर्दन, संधान, आसवन आदि क्रियाओं में गुजारा जाता है। इनमें ‘एकल तत्व पृथकीकरण’ का सिद्धांत है ही नहीं। विश्व की एकमात्र चिकित्सा प(ति ऐलोपैथिक है जिसमें ‘एकल तत्व पृथकीकरण’ का सिद्धांत और प्रकिया प्रचलित है। इसकी यही सबसे बड़ी समस्या है। एक अकेले साल्ट, एल्कलायड या सक्रीय तत्व के पृथकी करण ; (single salt sagrigation) से प्रकृति द्वारा प्रदत्त पदार्थ का संतुलन बिगड़ जाता है और वह विषकारक हो जाता है। हमारे चय-अपवय ;(metabolism) पर निश्चित रूप से विपरीत प्रभाव डालने वाला बन जाता है।
वास्तव मे इस प्रक्रिया में पौधे या औषध के प्रकृति प्रदत्त संतुलन को तोड़ने का अविवेकपूर्ण प्रयास ही सारी समस्याओं की जड़ है। पश्चिम की एकांगी, अधूरी, अनास्थापूर्ण दृष्टी की स्पष्ट अभिव्यक्ति ऐलोपैथी में देखी जा सकती है।
अंहकारी और अमानवीय सोच तथा अंधी भौतिकतावादी दृष्टी के चलते केवल धन कमाने, स्वार्थ साधने के लिये करोड़ों मानवों (और पशुओं) की बली ऐलोपैथी की वेदी पर चढ़ रही है। एकात्म दर्शन के द्रष्टा स्व. दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार पश्चिम की सोच एकांगी, अधूरी, असंतुलित अमानवीय और अनास्थापूर्ण है। जीवन के हर अंग को टुकड़ों में बाँटकर देखने के कारण समग्र दृष्टी का पूर्णतः अभाव है। प्रत्येक जीवन दर्शन अधूरा होने के साथ-साथ मानवता विरोधी तथा प्रकृति का विनाश करने वाला है। ऐलोपैथी भी उसी सोच से उपजी होने के कारण यह एंकागी, अधूरी और प्रकृतिक तथा जीवन विरोधी है।


एलोपैथ चिकित्सा पद्धति में किसी बिमारी को समग्र रूप में देखने के बजाय एकल रूप में देख कर ही इलाज किया जाता है, जो थोड़ी त्रुटिपूर्ण लगती है. एलोपैथ दवाओं का एक बड़ा व्यापार है, और व्यापारिक स्वार्थ एलोपैथ दवाओं को और घातक बना देता है.
अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धति, आयुर्वेद आदि, में समग्रता के बावजूद विगत में कई मामलें में असफल भी हुआ है. प्लेग, हैजा जैसी बीमारियों में अच्छे आयुर्वेदिक चिकित्सकों और औसधियों के अभाव, ज्ञान की कमी ने दुर्भाग्यवास आयुर्वेद पद्धति को शक के निगाह से देखने का मौक़ा दे दिया है. आज के समय में प्रतिभावान लोग आयुर्वेदसे नहीं जुड़ रहे हैं… कोई नई खोज-चान बिन नहीं हो रही है… जिन पौधों-फूलों से आसधि बनती है वो दोनों-दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं …. ये सारी बातें मिल कर आयुर्वेद पद्धति को विकल्प तक नहीं बनने दे रहे हैं.
उपरोक्त लेख पर सविस्तार चर्चा की ज़रूरत है. एलोपैथी के इस पक्ष को आजतक इस प्रकार से विश्लेषित नहीं किया गया है.