जाति विभेद की मानसिकता को हटाना जरूरी है

समाज की स्थापना के समय से ही जाति की अवधारणा किसी न किसी रूप में मौजूद रही थी, भल ही हम इसे वर्ग के रूप में स्वीकार करते हों। पूर्व में समाज में कार्य के अनुसार व्यक्ति को वर्गानुसार बाँटा गया था। यही बँटवारा बाद में जातिगत रूप में हावी हो गया।
वर्तमान में एकाएक जातिगत मामलों को लेकर विवाद का स्वरूप दिखाई देने लगा है। जनगणना में जातिगत प्रश्न के आ जाने मात्र से खलबली सी मच गई। एक वर्ग ऐसा है जो जाति के इस स्वरूप का विरोध कर रहा है और दूसरा पक्ष ऐसा है जो इसका समर्थन करता है। इस बिन्दु पर आकर विचार करना होगा कि आखिर जाति को लेकर यह घमासान अभी और इसी समय क्यों ?

जाति कोई नई अवधारणा तो है नहीं जो भारतीय समाज में इसी जनगणना के समय अचानक पैदा कर दी गई हो। यह वह प्रक्रिया है जो समाज के विकास के क्रम में मानव के साथ-साथ चलती हुई विकास को प्राप्त करती रही है। ऐसे में जबकि हमारे समाज का व्यापक समुदाय और व्यापक कार्य जाति के आधार पर ही चलते हों वहाँ जनगणना में जाति के प्रश्न पर इतनी आपत्ति क्यों होने लगी? यह एक ऐसा विरोध है जो किसी न किसी रूप में समाज के सुधार से नहीं अपितु व्यक्तित्व विकास से सम्बद्ध है।

जातिगत आधार का विरोध करने वालों ने इससे पूर्व किसी रूप में अपना विरोध दर्ज नहीं करवाया। इस बार के विरोध के पीछे एक मानसिकता समस्त जातियों के श्रेणीबद्ध होने और उनके आँकड़ेबद्ध हो जाने के प्रति है। देखा जाये तो समाज में पिछले एक-दो दशकों में जातिगत आधार ने अपना चरम स्वरूप प्रदर्शित किया है। विकास के नाम पर पिछड़ी जातियों को आगे लाने की झूठी वकालत करने वालों को जातिगत आधार पर जनगणना सवर्ण मानसिकता के विरुद्ध दिख रही है।

यहाँ हमारा सवाल यह है कि देश का तथाकथित बौद्धिक वर्ग जो समाज को जातिविहीन होने का सपना देखता है वह पिछले कुछ वर्षों में कहाँ छिपा था जबकि देश के शीर्ष राजनैतिक स्तर पर ही जातिगत राजनीति ही विकास के दौर में थी। केन्द्र की राजनीति कर रहे मुलायम सिंह, लालू यादव, रामविलास पासवान, शरद यादव जैसे कद्दावर नेता अपने किसी विशेष कार्य से नहीं वरन् जातिगत राजनीति के कारण चर्चा में रहे हैं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी जातिगत राजनीति के कारण सत्ता सुख भोग रहीं हैं। ऐसे में कहाँ और किस आधार पर हम जाति का विरोध कर रहे हैं?

होना तो यह चाहिए कि जातिगत विभेद को दूर करने से पहले जातिगत मानसिकता को दूर किया जाये। जाति किसी भी व्यक्ति के लिए अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व की पहचान हो सकती है अथवा नहीं भी हो सकती है किन्तु जातिगत आधार पर ही उस व्यक्ति के साथ भेदभाव करना उचित नहीं। हमने जाति के विभेद के मूल को दूर किये बिना ही जाति को समाप्त करने की वकालत करना शुरू कर दी। यह कम से कम आज के दौर में इस कारण से सम्भव नहीं क्योंकि देश के लाखों लोगों की रोटी इसी जाति के आधार पर चलती है।

चुनाव के समय अपनी अपनी जाति को प्रमुखता से दर्शाने और इस आधार पर वोट पाने का षडयन्त्र किसी से भी छिपा नहीं है। वर्तमान में मिड डे मील में जाति विशेष की महिला को रसोइया बनाने का शासनादेश किस जातिविहीन समाज की अवधारणा निर्मित कर रहा है, पता नहीं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदेशों में आरक्षण की सीमा को पचास प्रतिशत से ज्यादा कर देने की छूट देना भी तो जातिगत समाज का निर्माण करने के प्रति ही प्रेरित करता है।

जब देश की सर्वोच्च अदालत ही जाति के आधार पर समाज का विकास होते देखने को मान्यता देती हो; संसद में भी जातिगत आधार पर अपनी-अपनी सीटों को पक्का समझा जाता हो; प्रदेशों में सत्ता को पाने का हथियार जनमत न होकर जातिमत हो; बच्चों को पढ़ाने के लिए उत्तम व्यवस्था करवाने के स्थान पर इस बात के शासनादेश लागू किये जायें कि खाना जाति विशेष के आधार पर बनाया जायेगा तो समाज के जातिविहीन होने की संकल्पना अभी कोरी कल्पना ही लगती है।

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About कुमारेन्द्र

उ0प्र0 के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जनपद जालौन में 1973 को जन्म। शिक्षा के रूप में डिग्रियाँ बटोरते हुए बी0एस-सी0 (गणित) के पश्चात अर्थशास्त्र, हिन्दी साहित्य और राजनीति विज्ञान में एम0ए0 और साथ ही हिन्दी साहित्य में (वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों में अभिव्यक्त सौन्दर्य का अनुशीलन) पी-एच0डी0 की उपाधि प्राप्त की। पत्रकारिता में विशेष रुचि होने के कारण पत्रकारिता एवं जनसंचार का स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी हासिल किया। ---- लेखन में बचपन से ही रुचि होने के कारण साहित्यिक यात्रा की शुरुआत वर्ष 1983 में ही कविता लेखन और उसके प्रकाशन के साथ प्रारम्भ हो गई थी। देश की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों, कविताओं, लेखों, शोध-आलेखों आदि का नियमित रूप से प्रकाशन होता रहता है। ---- वर्तमान में पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही इंटरनेट पर ब्लॉग के द्वारा एवं विभिन्न साइट के द्वारा भी लेखन में सक्रिय हैं। ---- अद्यतन दस पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है। इसमें एक कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह के अतिरिक्त तीन पाठ्यक्रम सम्बन्धी, दो पर्यावरण सम्बन्धी, एक कन्या भ्रूण हत्या निवारण सम्बन्धी पुस्तक प्रमुख है। ---- सामाजिक क्षेत्र में रुचि होने के कारण विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक संस्थाओं में भी सक्रिय भागीदारी। स्वयं द्वारा संचालित सामाजिक संस्था ‘दीपशिखा’ के प्रमुख कार्यकारी होने के साथ-साथ सूचना अधिकार का राष्ट्रीय अभियान के निदेशक, पी-एच0डी0 होल्डर्स एसोसिएशन के संयोजक तथा शोध संस्था ‘समाज अध्ययन केन्द्र’ के निदेशक पद का कार्यभार। ---- अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक पत्रिका ‘स्पंदन’ तथा अन्तर्राष्ट्रीय रिसर्च जनरल ‘मेनीफेस्टो’ के सम्पादक। ---- सम्प्रति गाँधी महाविद्यालय, उरई में हिन्दी विभाग में प्रवक्ता पद पर कार्यरत। ---- सम्पर्क 09793973686 ई-मेल - dr.kumarendra@gmail.com वेब पेज - रायटोक्रेट कुमारेन्द्र (http://kumarendra.blogspot.com) - शब्दकार (http://shabdkar.blogspot.com)
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One Response

  1. श्री कुमारेन्द्र जी

    एक दम सही विश्लेषण है बन्धु, वैसे तो जातिवाद पर प्रश्न खडे होते ही रहे है, फ़िर भी राजनिति में जातिवाद ने जो आश्रय बनाया उसकी सराहना कहीं भी नहिं हुई।
    आपने कहा……।
    “देखा जाये तो समाज में पिछले एक-दो दशकों में जातिगत आधार ने अपना चरम स्वरूप प्रदर्शित किया है। विकास के नाम पर पिछड़ी जातियों को आगे लाने की झूठी वकालत करने वालों को जातिगत आधार पर जनगणना ‘सवर्ण मानसिकता’ के विरुद्ध दिख रही है।”
    -सवर्ण मानसिकता से आपका अभिप्राय अपमान अत्याचार वाली मानसिकता से है,तो यहां किसतरह यह प्रयोजन सिद्ध होगा?
    आपने कहा……
    “यह कम से कम आज के दौर में इस कारण से सम्भव नहीं क्योंकि देश के लाखों लोगों की रोटी इसी जाति के आधार पर चलती है।”
    -जन्म जाति आधार पर तो आज के युग में रोटी खाने वाला एक ही वर्ग है,कर्मकाण्डी ब्राहमण।
    बाकी सभी तो अपनी शिक्षा,कौशल,हुनर एवं श्रम पर जीविकोपार्जन करते है।जाति आधारित नहिं।
    खैर आपको आमंत्रित करता हुं, ब्लोग संसद मे पधार कर अपना मंतव्य और दृष्टिकोण रखें आपकी राय की वहां त्वरित आवश्यक्ता है।
    http://blog-parliament.blogspot.com/

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