कृष्ण कुमार

हिन्दू होने के मायने खोजने वक्त अपनी निजी नियति से घिर जाना बहुत आसान है। मेरी समझ में हिन्दू होने का कोई ऐसा अर्थ सोच सकना या बता पाना बहुत कठिन है जो सभी हिन्दुओं को मान्य हो। यह बात लिखते हुए मैं निश्चय ही इस मान्यता से प्रभावित दिख रहा हूं कि अन्य धर्मों के सन्दर्भ में उपर कही गयी बात लागू नहीं होती। यह मान्यतः वस्तुतः कितनी सच है, यह जांचने का मेरे पास कोई व्यक्तिगत आधार नहीं है; न ही मेरे पास ऐसे साधन हैं जिनकी मदद से मैं इस मान्यता का परीक्षण का सकता। ऐसा एक मुख्य साधन ज्ञान हो सकता था- यानी यदि मेरे पास सभी धर्मों का पर्याप्त ज्ञान होता तो मैं हिन्दू होने के अर्थ की ईसाई, मुसलमान, बौद्ध, या यहूदी होने के अर्थ से तुलना कर सकता था। पर थोड़ा और सोचा जाये तो यह संभावना भी एक भ्रम ही ठहरती है। ज्ञान यदि अनुभव बन सकता या अनुभव का रास्ता ही प्रशस्त कर सकता होता, तो विभिन्न धर्मों अनुयायियों के झगड़े बहुत कम हो जाते। धर्म के बारे में जानना और उसे जीना शायद एक दूसरे से काफी अलग प्रक्रियाएं है।
किसी धर्म में पैदा होकर हम एक समूचा वातावरण अपने भीतर बिठा लेते हैं। थोड़ी बड़े होने तक अपने भीतर रचे हुए उस वातावरण से हम इतना गहरा सामंजस्य बिठा चुके होते हैं कि उससे दूर होकर दुनिया को देख ही नहीं सकते। साथ ही इस भीतरी वातावरण को भी हम निरपेक्ष होकर नहीं देख सकते। इसीलिए जब कोई किसी धर्म में निहित आदर्शो की बात करता है तो वह दरअसल उन ग्रन्थों या परम्पराओं में निहित आदर्शों का विश्लेषण कर रहा होता है जो उस धर्म से जुड़े हैं। यह कतई जरूरी नहीं है कि उस धर्म को मानने वाला कोई व्यक्ति उन आदर्शों से अनुप्राणित भी हो। इस तरह के विशलेषणों का महत्व बहुत से बहुत संवाद चलाने के लिए होता है। संवाद दूसरे धर्मों के साथ हो सकता है और एक धर्म के भीतर भी हो सकता है। हिन्दू धर्म और जीवन पद्धति के आदर्शों का सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा किया गया विश्लेषण अन्य धर्मों के साथ संवाद का एक उदाहरण है। इस विश्लेषण की एक हिन्दू के लिए शायद ही कोई प्रासंगिकता हो। इसी तरह के विश्लेषण ईसाई या इस्लाम धर्म के संदर्भ में कई करे, और कइयों ने किये भी हैं, तो उनका महत्व एक ईसाई या एक मुसलमान के लिए विशेष नहीं होगा। इसी तर्क के तहत हम कह सकते है कि रसेल ‘मैं ईसाई क्यों नहीं हूं’ जैसी पुस्तक का भी कोई खास अर्थ एक ईसाई पाठक के लिए नहीं हो सकता। ऐसे शख्स का उदाहरण ढूंढ़ना कठिन होगा जिसने यह किताब पढ़ कर ईसाई न रहने की प्रेरणा पायी हो।
एक धार्मिक समूह में पैदा होने का आषय कुछ प्रतीकों, मान्यताओं, विश्वासों और व्यवहारों से जुड़े होने से अधिक आंकना व्यर्थ है, हालांकि हम कई बार इस इच्छा से भर उठते हैं कि अपने धर्म को अपने निजी संदर्भ में और गहरी व्याख्या करें। यह इच्छा विशेषकर तब पैदा होती है जब हम अपनी धार्मिक पहचान को लेकर किसी त्रासदी से गुजर रहे होते है। हिन्दू होने के नाते मेरे जैसे लोग 6 दिसम्बर 1992 की रात इस इच्छा से बुरी तरह घिर गये थे। हमारी कई मान्यताओं के उस दिन भयानक चोट पहुंची थी, इस कारण ये मान्यताएं हमें अपने हिन्दू होने के यकीन दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं रह गयी थी। सबसे बड़ी मान्यता, जो उस दिन आहत हुई थी, स्वयं अपने बारे में थी- कि हम ऐसा काम करनेवालों में नहीं है। हिन्दू होने के जातीय संस्कारों में यह एक महत्वपूर्ण संस्कार है कि हिन्दू धर्म दूसरों की धार्मिक इमारतें तोड़ कर नहीं फैला। इस संस्कार को ऐतिहासिक दृष्टि से जांचना व्यर्थ नहीं है, क्योंकि संस्कार इतिहाससम्मत या तथ्यसम्मत नहीं होते। इस कारण् बौद्ध इमारतों या संस्थाओं को हिन्दू शक्तियों द्वारा सुदूर अतीत में पहुंचाया गया नुकसान इस विश्वास पर कोई असर नहीं डाला पाता है कि हम हिन्दू ‘ऐसा’ नहीं करते हैं। इस विश्वास को 6 दिसम्बर की घटना ने गहरी चोट पहुंचायी। इस चोट की वजह से हममें से अनेक लोग अभी तक अपनी-अपनी धार्मिकता की गहरे से गहरे स्तर पर विवेचना करने का प्रयास किये चले जा रहे है।
चोट का कष्ट हमें दो दिशाओं में ले जा सकता है। एक दिशा है कष्ट को भूलने के तरीके जुटाने की। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अयोध्या की घटना का दोश सरकार को देना हमारी मदद करता है। घटना के लिए जिम्मेदार दलों व संगठनों ने प्रधानमंत्री को दोश दिया और इस तरह अपने आपको अपराधमुक्त करने के अलावा उस जन-सामान्य को भी अपराधी भाव से छुटकारा दिलाने का प्रयास किया जो अयोध्या के विवाद मे भाजपाई दृष्टि का पक्षधर था। भाजपाई तर्कप्रणाली कितनी वक्र और छली होती है, यह दिखाने के लिए यहां मेरे पास जगह नहीं है ‘‘रूचि रखनेवाले पाठक नवभारत टाइम्स में 13 मई 1991 को प्रकाशीत भरमानेवाले शब्दों के अर्थ’ शीर्षक मेरा लेख देख सकते हैं। यहां इतना ही बताना पर्याप्त है कि भाजपा की एक आंख बराबर इस जिम्मेदारी पर रही है कि उसकी सर्मथक जनता 6 दिसम्बार की घटना को मनोवैज्ञानिक ढंग से पचा सके। ऐस करने के लिए कांग्रेस की राजनीति और भाजपा की राजनीति में फर्क स्थापित करना जरूरी था। ‘राजनीति वे करते है हम तो अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं’ – इस प्रचार को सफलता मिली ही इस कारण है कि भाजपा के बरी होने में कम-से-कम उत्तर भारत के हिन्दू मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से की अपराधबोध से मुक्ति निहित थी। इस वर्ग और भाजपा के बीच तादात्म्य काफी पहले स्थापित हो चुका था (इस तादात्म्य का विश्लेषण मैंने अभय कुमार दुबे द्वारा सम्पादित ‘सांप्रदायिकता के स्त्रोत’ शीर्षक पुस्तक में किया है, जो विनय प्रकाशन से 1993 में छपी है), इस कारण अपराधबोध से छुटकारे का जिम्मा उसी संगठन पर आता था जिसने अपराध किया था।
अपराधबोध के कष्ट, जिसमें आत्मछवि को पहुंची चोट का कष्ट ही प्रमुख है, को भूलने की दिशा में बढ़ने के और भी अनेक साधन हैं। व्यस्त रहना आधुनिकता का लक्षण और तकाजा है। नयी चिन्ताएं, नये कार्यक्रम विशाल जनसमूहों की स्मृति को उलझा देने, उसे नये आकार में गढ़ देने के लिए नियमित रूप से सायास इस्तेमाल किये जाते हैं। अयोध्या की घटना को भुलाने में भाजपा और उसके सहकर्मियों के अलावा सरकार की भी पूरी रूचि है, क्योंकि भले सरकार स्वयं अपराधी न रही हो, अपराध ठीक से किया जा सके, इसका इंतजाम तो उसने किया ही था। वैसे भी पूंजीवादी व्यवस्था के तहत विकास में रचना और स्मृति को परस्पर विरोधी बना दिया जाता है। विकास की प्रक्रिया में आंख मूंद कर आगे बढने का जो भाव आज अनिवार्य रूप् से प्रतिष्ठित है, उसकी मांग रहती है कि परसों की घटनाओं को भुला दिया जाये। आपात्काल, ‘ 84 का सिख हत्याकांड और ऐसी कई घटनाओं की तरह अयोध्या के ध्वंस को भुला देना पूंजीवादी विकास की मानसिक तैयारी का अंग है। फिर जिस घटना में आत्मछवि पर लगी चोट का कष्ट छिपा हो, उसे भुला देने को तो लोकमन वैसे भी लालायित है।
चोट का कष्ट जिस दूसरी दिशा में हमें ले जा सकता है, वह आत्ममुग्धता से मुक्ति की दिशा है। आत्ममुग्ध होने का भाव वैसे तो हरेक धर्म में रहता है, पर हमारे धर्म में कुछ ज्यादा ही है यह कम-से-कम इन सौ-सवा सौ वर्षों में अतिरेक पर रहा है। इस भाव को बढ़ाने में मैक्समुलर सरीखे उन पश्चिमी विद्वानों ने खासी मदद की है जो उद्योगीकरण से पैदा हुए सांस्कृतिक खालीपन को भरने की कोशीश में सुदूर धर्मों और संस्कृतियों को समझने की चेष्टा कर रहे थे। औपनिवेशिक गुलामी से आहत हमारे उस समय के बौद्धिकों के लिए इस किस्म के विदेशी प्रमाणपत्र बहुत प्रिय साबित हुए। हिन्दू समाज की आत्ममुग्धता को वैसे भी लम्बे समय से किसी ने नहीं छेड़ा था। बुद्ध और कबीर के द्वारा छेड़े जाने की स्मृति काफी धूमिल हो चुकी थी। हम भी कुछ हैं और दूसरों से बहुत ही विशिष्ट हैं, यह भाव हमारे श्रेष्ठ चिन्तक में असमर्थ रहा। ‘‘मैं यहां दक्षिण के समाज की बात नहीं कर रहा जिसकी क्रियात्मक और प्रतिक्रियात्मक दोनों ही शक्तियां काफी अलग ढंग से विकसित हुई हैं’’।
हिन्दू आत्ममुग्धता को यदि कोई घटना विदीर्ण कर सकती थी तो वह महात्मा गांधी हत्या थी। इस घटना में वे सारे तत्व निहित थे जो हमें यह मानने के लिए मजबूर करते कि औरों से विशिष्ट नहीं हैं, कि हमारी जीवन दृष्टि में भी वह सम्पूर्णता, गहराई और धीरज नही है जिसका अभाव हम अन्य धर्मों से जुड़ी जीवन दृष्टियों में पाते हैं। लेकिन गांधी की हत्या से उभरनेवाली यह संभावना बहुत जल्द लुप्त हो गयी। कानूनी प्रक्रियाओं और राजनीति ने मिल कर हिन्दू समाज को इस संभाविता से वंचित कर दिया कि वह गांधी की हत्या से पैदा हुए अंधेरे से जूझे। मुझे ऐसा भी लगता है कि ऐसी किसी घटना से जूझने का संस्कार हिन्दू मन में नहीं है। किसी अपराध को सामूहिक बोध में ढाल लेने का ऐसा संस्कार यदि हमारे मन की बुनावट में होता, तो द्रोपदी के अपमान की बदौलत हम अपने समाज में स्त्री की नियति को कब का बदल चुके होते। शम्बूक और एकलव्य की नियति को यदि सामूहिक स्तर पर भोग सके तो दलितों का ही नहीं, भारत का इतिहास कुछ और होता। इतना अवष्य है कि हम अपराध से स्तब्ध होते हैं, जैसे भीष्म हुए थे, लेकिन फिर हम उसे अपने-अपने, निजी स्तर पर चिंता और जरूरत पड़ी तो पश्चाताप का विषय बनाते है।
हमारा यह स्वभाव, जाति व्यवस्था की मनोवैज्ञानिक प्रतिच्छवि है। जाति के दायरे हमारे तीखे-से-तीखे अनुभव की परिपाटी की सीमा में सिमटाये रखते है। जाति व्यवस्था के चलते हम ऐसी सामाजिक उर्जा कभी पैदा नहीं कर सकेंगे जो मनुष्य की प्रतिभा को खोलती हो। ऐसी उर्जा दर्द और सहानुभूति से ही पैदा हो सकती है, बशर्ते ये अनुभव लौकिक जीवन के सन्दर्भ में सामूहिक पैमानों पर किये जायें सवर्णावस्था और दलितावस्था में बंटी हई सामाजिकता दर्द के सामूहिक पैमाने पर विकसित ही नहीं होने देगी। इस दुश्चक्र को तोड़ना उस दिशा में बढ़ने की आवशीक शर्त है जिसे अयोध्या के युद्ध में हिन्दू संस्कारों को पहुंचायी गयी चोट ने खतरनाक ढंग से खोला है। इस दिशा में आगे बढ़ने पर आत्ममुग्धता से मुक्ति के साथ उन भयानक अंधेरों से जूझने की ताकत भी हिन्दू जन को मिलेगी जो पूंजीवाद की उत्पादन पद्धति और संस्कृति से पैदा हो रहे हैं।
जाहिर है, यह समूची संभावना इस बात पर निर्भर है कि हम एक नया संस्कार गढ़ पाते हैं या नहीं। यह कहते हुए मैं भूल रहा हूं कि संस्कार सायास नहीं गढ़े जाते, वे तो कर्म से पैदा हुए अनुभव की सामूहिक मन पर पड़ी छाप होते हैं। हम बहुत से बहुत इतना कर सकते हैं कि अपने समय में पड़ रही अन्य प्रतियोगी छापों को पहचानें और जिस छाप को हम वरेण्य समझते हैं, उसके लिए जगह बनायें। यह काम एक ऐसे समय में बहुत जोखिम भरा बन गया है जब हिन्दू मन को फासीवादी सामाजिक बुनावट में पिरो देने की जबरदस्त तैयारी हो चुकी है। फासीवाद किसी धर्म या समाज विशेष की बपौती नहीं हैं, उपयुक्त परिस्थितियां मिलने पर वह किसी भी समाज में उग जाता है। सवर्णता के स्वार्थ और दुराग्रह, जो आजादी के आंदोलन से क्षतिग्रस्त हुए थे, पूजीवाद के उत्थान की परिस्थितियां पर कर फासीवादी आतंकतन्त्र का रूप लिया चाहते हैं। उनका सामना करने में वह अंग्रेजीभाषी धर्मनिरपेक्ष वर्ग एकदम असमर्थ है जो हिन्दू मन की चर्चा को ही व्यर्थ और शायद प्रतिगामी मानता है। यह संकुल माहौल में संवाद चलाने की खातिर ही सही, हिन्दू मन की खोज एक उपयोगी उपक्रम है।


आदरणीय श्री कृष्ण कुमार जी आपके लेख को समझ सकने की समझ रखने वालों के लिये आपका आलेख निश्चय ही सोचने पर विवश करता है। हिन्दू धर्म एवं हिन्दू धर्म के अनुयाईयों की मानसिकता का आपने बहुत ही उम्दा विश्लेषण किया है।
लेख को ओपान्त (शुरू से अन्त तक) पढने पर लगता रहा, जैसे मैं आपका लेख नहीं पढ रहा, बल्कि आपके मुख से ही एक एक शब्द सुन रहा हँू। आपकी लेखन शैली गजब की है। जिसके लिये मैं केवल आपका आभार ही प्रकट कर सकता हँू।
इसे या तो मेरी समझ की कमी कहँू या फिर कोई और बात लेकिन इस विश्लेषणात्मक लेख के माध्यम से मैं आम व्यक्ति को कोई एक लाईन का सन्देश देने में अपने आपको अक्षम पा रहा हँू। मुझे कोई निष्कर्ष समझ में नहीं आ रहा है। लेख में पाठक को बांधे रखने और उसके विचारतन्त्र को हिला देने की शक्ति है, लेकिन कहीं भी कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। शायद यह मेरी समझ की ही कमजोरी रही है। धन्यवाद।
कृष्ण जी ! मेरा मानना है कि ; हिन्दू न तो कोई धर्म है न हमारे ग्रंथों में कहीं लिखा है कि “ये” हिन्दू धर्म ग्रन्थ हैं हिन्दू तो केवल एक सभ्यता है संस्कृति है | इसलिए “ये” (ढांचा गिराना) इनका मानव स्वभाव है जो इन्होने किसी आक्रान्ता के द्वारा तोड़े गए मंदिर पर खड़े उसके नाम के सदियों पुराने ढांचे को ढहा दिया | क्या करें दुनिया की बुराईयाँ देख कर और सह कर अब इन्हें भी उसी नीति पर चलना भा रहा है | ये मानव स्वभाव की कमजोरी हैं | दुनिया वाले तो शांति के दूतों को नहीं बख्स रहे, ये कमसेकम केवल हमलावरों की निशानियों को ही तोड़ रहे हैं | इसमें अधिक शर्मिदा
लगभग दो अरब वर्ष ( हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार) प्राचीन संस्कृति, या सबसे पौराणिक धर्म, इसके अनुसार मान्यता है कि; हमें अपने पूर्व जन्मों का पाप भोगना ही पड़ता है | इसे हिन्दू लोग प्राकृतिक न्याय मानते हैं | तो ! कुछ लोग अपने पिछले जन्मों में दूसरे श्रेष्ठ धर्मों (उनके अनुसार) में पैदा होकर पाप कर्म करके, सजा भोगने को इस जन्म में हिन्दू धर्म में पैदा हो गए | अब उन्हें कदम – कदम पर शर्मसार होना पड़ता है ; क्या करें कर्म ही ऐसे करके आये हैं | दीवार की लकीर होती तो मिटा देते या इससे बड़ी खींच देते | ये जानते हैं कैसे-कैसे विद्वान् महापुरुष हुए, वे तक ऐसा कोई काम नहीं कर पाए |
अब दुर्भाग्य ये है कि जो अच्छे कर्म करके इस धर्म में पैदा हुए गर्व करते हैं, उन्हें भी शर्मिंदा होना पड़ता है कि वे सबसे श्रेष्ठ थे आज कुछ लोगों की गुलाम मानसिकता के कारण ये दिन देखने पड़ रहे हैं | इस धर्म ने अरबों वर्षों से अपनी दादागिरी चला रखी है कभी जगढ़ुरु बन जाता है तो कभी शांति का मसीहा | और आज अपने ही उसको जो मर्जी सो बोल देते हैं क्या दिन आ गए ?