दस्तावेज़|2010/09/21 10:53 am

लोकनायक के ऐतिहासिक पत्र-3

साम्यवाद से जनतंत्रीय समाजवाद की ओर आजादी की लड़ाई

सन 1929 में जब मै। अपने देश वापस आया, वह समय मार्क्सवाद के लिए अनुकूल नहीं था। राष्ट्रीय भावना अपनी चरम सीमा पर थी। उसी वर्ष दिसम्बर महीनें में, जब गांधी जी कलकत्ता कांग्रेस के प्रस्ताव के अनुसार भारतवर्ष के लिए पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग को लार्ड इरविन से स्वीकार कराने में सफल न हुए, तो राष्ट्रीय आजादी की ओर एक लम्बी उड़ान मारने के लिए क्षेत्र तैयार हो गया। पूर्ण स्वराज्य राष्ट्रीय आन्दोलन का लक्ष्य रखा गया और दूसरे वर्ष के प्रारम्भ में ही महात्मा गांधी ने अपना सुविख्यात नमक सत्याग्रह शुरू कर दिया। स्वाभाविक ही था, मैं अपने पूरे उत्साह के साथ इस संघर्ष में कूद पड़ा। लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट मुझे इस संघर्ष के किसी भी ओर-छोर पर दिखाई नहीं दिये। यह बात सच है कि उनमें से कुछ लोग मेरठ षड्यन्त्र-केस के सिलसिले में जेलों में बंद थे। किन्तु काफी लोग बाहर ही थे और सीपीआई का गुप्त संगठन ज्ञी किसी न किसी रूप में चल ही रहा था। मैं जल्दी ही फरार हो गया था, किन्तु राष्ट्रीय आंदोलन के इस अज्ञात क्षेत्र में भी कम्युनिष्ट कहीं दिखाई नहीं दिए। यदि वे भी इस आंदोलन के फरारी होते, तारे दो फरारियों का सम्पक्र गुप्त रास्तों से आसानी से हो सकता था। वस्तुस्थिति इससे भी बदतर थी। मैंने सुना कि वे लोग राष्ट्रीय आंदोलन को बुर्जुआ आंदोलन और महात्मा गांधी को भारतीय बुर्जुआ वर्ग का पिट्ठू कहकर निन्दा कर रहे है। मैं शर्म और अज्ञान से भरी हुई उस पूरी कहानी की याद दिलाना नहीं चाहता। मैंने उसका जिक्र यहां केवल यह बताने के लिए किया है कि भारतीय कम्युनिस्टों और उनकी माक्र्सवादी छाप से मेरे मतभेद कैसे पैदा हुए। हिन्दुस्तान के कम्युनिस्ट वास्तव में तीसरे या कम्युनिस्ट इंटरनेशनल, जो उस समय तक पूरी तरह स्टाॅलिन के नेतृतव में आ चुका था, द्वारा निर्धारित नीति का अनुसरण कर रहे थे। कमिन्टर्न कम्युनिस्ट इंटरनेशनल सन 1928 से ही स्पष्टतया गलत नीति पर चल रहा था। उसके परिणामस्वरूप सारी दुनिया के मजदूर और समाजवादी आंदोलनों में फूट पड़ गयी थी और सारे औपनिवेशिक प्रदेशों में कम्युनिस्ट राष्ट्रीय आंदोलनों से कटकर अकेले पड़ गये थे। मुझे लगा, जैसा दरअसल बाद में स्वीकार भी किया गया, वह नीति सामान्यतया माक्र्सवादी सिद्धान्त के और विशेषतया महान् नेता लेनिन के द्वारा प्रतिपादित प्रसिद्ध औपनिवेशिक नीति के विरूद्ध थीं इसी प्रकार भारतीय कम्युनिस्ट र्पाअी के साथ मेरे मतभेदों ने स्वयं सोवियत रूस के साथ मेरे सैद्धांतिक विरोध की नींव डाल दी। सोवियत रूस उस समय तक मेरे लिए समस्त कम्युनिस्ट सद्गुणों का उच्चतम नमूना और आदर्श था। कुछ साल पहले से ही रूस में जो सैद्धान्तिक संघर्ष और सत्ता के लिए लडऋाई चल रही थी, उसने अब तक एक दबी हुई चिन्ता के सिवा मेरे अन्दर और कोई स्थिर प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं की थी। वास्तव में उन घटनाओं के संबंध में उस समय तक अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी। किन्तु जब अपने देश में सोवियत रूस द्वारा निर्दिष्ट नीति से मुंहामुंही हुई, मेरा माक्र्सवादी ज्ञान उससे संतुष्ट हो ही नहीं सका और इसलिए उसका विरोध किये बिना मुझसे न रहा गया।

कांग्रेस समाजवादी दल

स्वाभाविक था, मैं भारतीय कम्युनिस्ट दल से अलग रहा और स्वतंत्रता संग्राम के सैनिकों में सम्मिलित हो गया। किन्तु उस समय तक स्वतंत्रता या स्वराज्य का अर्थ मेरे लिए केवल राष्ट्रीय आजादी ही नहीं रह गया था, बहुत व्यापक हो गया था। स्वतंत्र भारत का अर्थ मैं समाजवादी भारत करता था ओर स्वराज्य से मेरा आशय था गरीब और पददलित लोगों का राज्य। इस विषय में प्रसिद्ध कराची-घोषणा के बावजूद मुझे आवश्यक था, हमने स्वतंत्रता संग्राम में समान विचार रखनेवाले सैनिकों का एक कांग्रेस समाजवादी दल संगठित कर लिया, ताकि कांग्रेस की सामाजिक नीति और अधिक निश्चित रूप से समाजवादी हो सके और स्वतंत्रता की लड़ाई ही कुछ और अधिक क्रांतिकारी ढंग से चलायी जा सके। मार्क्सवादी परिभाषा में उसका अर्थ होता है, राष्ट्रीय स्वतंत्रता के आंदोलन को जनता के आर्थिक और सामाजिक विस्तार के आंदोलन से जोड़ देना। कांग्रेस समाजवादी दल ने कांग्रेस की नीति के सामाजिक आर्थिक पहलू को स्वरूप देने और आजादी की लड़ाई को मजबूत बनाने में एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा लिया है। स्वातंत्र्य-संग्राम के कभी न झुकनेवाले और निर्भीक सैनिकों में अधिकांश कांग्रेस समाजवादी ही थे।

हिटलर का उत्थान और लोकप्रिय मोर्चा

सन 1930 के आरम्भ में जन-राष्ट्रीय आंदोलन तेजी पर थां यूरोप में उद्वेगकारी घटनाएं घट रही थीं। उनका चरम उत्कर्ष था-हिटलर का अपने हाथ में सत्ता ले लेना। स्टाॅलिन ने भविष्यवाणी की थी कि हिटलर का पतन शीघ्र होगा, क्योंकि एक अर्ध विक्षिप्त व्यक्ति जर्मनी की जटिल और विषम समस्याओं को सुलक्षा नहीं सकेगा। स्टाॅलिन ने यह भी भविष्यवाणी की थी कि हिटलर की सत्ता के खंडहरों पर कम्युनिस्ट जर्मनी का महल खड़ा किया जायगा। जब इस प्रकार की कोई भी चीज नहीं हुई-बल्कि हिटलर ने उल्टे अपनी शक्ति संगठित कर ली और कम्युनिस्टों, समाजवादियों और शक्तिशाली ट्रेड-यूनियनों को दबा दिया, विश्व विजय के लिए तैयारी शुरू कर दी और उसकी योजनाएं सफल होने लगीं-तब आखिरकार क्रेमलिन के स्वामी का आसन डोला और तेजी से पैंतरा बदला गया।

अब खोद-खोदकर कब्र में से स्टाॅलिन की गलतियां निकालने का प्रचलन हो गया है। कुछ क्रुश्चेव ने खोदकर निकाली है। जुकोव और गहरा खोदने के लिए उत्सुक मालूम होता है। मुझे वैसा कुछ करने की कोई इच्छा नहीं है। किन्तु मैंने अन्यत्र जो कहा है, उसे दोहरा देना चाहता हूं कि एक समय आएगा, जब स्टाॅलिन की गलतियो मे सबसे अधिक गम्भीर, सबसे अधिक दूषित और सबसे अधिक महंगी पड़नेवाली गलती, उसका उन विघटनकारी नीतियों को अपनाना घाषित होगा, जिनके कारण हिटलर के हाथ में सत्ता आयी। जर्मनी के कम्युनिस्टों ने यदि स्टाॅलिन से प्रेरणा लेकर सोशल डेमोक्रेटों को अपना प्रथम श्रेणी का और नाजियों को तदुपरान्त ही अपना शत्रु घाषित न किया होता, तो हिटलर कभी भी जर्मनी का मालिक नहीं बन सकता था। समाजवादी एकता और लोकप्रिय मोर्चे की जो नीति नाजीवाद की सफलता के बाद अपनायी गयी थी, यदि शुरू से ही उस पर अमल किया गया होता, तो नाजी आतंक और द्वितीय महायुद्ध का कभी दर्शन ही न होता।

इस लोकप्रिय मोर्चे की नीति का प्रभाव भारत पर भी पड़ा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने संकेत पाकर अपना रूख बदला और वर्षों तक आक्षेप करने, निन्दा ओर गालियां देने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को उन्होने अचानक राष्ट्रीय मोर्चा स्वीकार करके उसका समर्थन किया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस समाजवादी दल की संधि

अभी भी माक्र्सवाद से आत्मीयता होने के कारण इस नयी नीति से मेरा हृदय आनन्दमग्न हो गया और मेरी आशाएं उंची उठने लगीं। मैं एक संयुक्त आनन्दमग्न हो गया और मेरी आशाएं उंची उठने लगीं। मैं एक संयुक्त सोशलिस्ट कम्युनिस्ट दल की सम्भावना के स्वप्न देखने लगा। मुझे लगा, इस प्रकार के संयुक्त नेतृत्व में स्वातंत्रय आंदोलन और भारतीय समाजवाद दोनों बड़ी तेजी से कूदते-फांदते हुए आगे बढंगे।

श्री राममनोहर लोहिया, एम0 आर0मसानी, अच्युत पटवर्धन और अशोक मेहता जैसे मेरे कुछ प्रमुख साथियों ने इस नीति का विरोध किया। उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया था कि इसका अन्त दुःखद होगा। किन्तु मेरे माक्र्सवादी जोश ने मेरी तर्कशक्ति पर विजय पाली और नरेन्द्रदेवा जैसे आदरणीय साथी के समर्थन से मैं अपने स्वप्नों और आशाओं को लेकर आगे बढ़ आया।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक समझौता हो गया, जिसके अनुसार कांग्रेस-सोशलिस्ट दल की सदस्यता कम्युनिस्टों के लिए खोल दी गयी। कांग्रेस-सोशलिस्ट दल की शाखाएं, खास तौर से दक्षिण भारत में, जान बूझकर कांग्रेस-सोशलिस्ट दल के वफादार लोगों की उपेक्षा करके कम्युनिस्टों के हाथों सौंप दी गयीं। कांग्रेस सोशलिस्ट दल के समर्थन से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी तथा कांग्रेस की अन्य संस्थाओं में भी कम्युनिस्ट चुने गये। ट्रेड युनियन आंदोलन के संबंध में यह तय हुआ की दोनों मिलकर साथ साथ काम करें।

संयुक्त मोर्चें के मायाजाल से मुक्ति

इस नीति के घातक परिणाम सर्वविदित हैं। प्रसंग के लिए उनमें से एक तो यही हैं कि सारा दक्षिण भारत कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों में चला गया। किन्तु उस दुःस्वप्न जैसे अनुभव से एक बड़ा लाभ हुआ। उसने राजनीति के क्षेत्र में हमें एक अच्छा सबक सिखा दिया। हम लोगों ने हममें से कुछ ने काफी दुःख के साथ सीख और समझ लिया कि किसी प्रमाणप्राप्त कम्युनिस्ट पार्टीं के सथ ऐक्य नहीं हो सकता। कमिन्टर्न से सम्बद्ध या क्रेमलिन से प्रमाणित कम्युनिस्ट पार्टी मास्कों के हाथ की कठपुतली मात्र है। वह स्वतंत्र प्रतिनिधि नहीं है। ऐसी पार्टी के सदस्य पहले रूस के प्रति वफादार होते हैं, उसके बाद ही किसी दूसरे के प्रति वफादारी दिखा सकते हैं। कम्युनिस्ट पार्टिंयां जब-जब संयुक्त मोर्चे की बात करती हैं, वह हमेशा एक बहाना होता है और नहीं तो संकटपूर्ण स्थिति से विवश होकर अपनायी हुई एक अल्पकालिक नीति। एकच्छत्र कम्युनिस्ट राज्य ही हमेशा उनका एकमात्र लक्ष्य रहता है। कम्युनिस्ट बला टालने की वृत्ति से अपने पिट्ठुओं के सिवा किसी दूसरे को सत्ता देने की ता कभी सोच ही नहीं सकते। ये थे व अमूल्य सबक, किन्तु इनके लिए जो कीमत चुकानी पड़ी, शायद वह बहुत ज्यादा थी। युद्ध ने इन निष्कर्षों को और भी पुष्ट कर दिया और इतनी अधिक आशा के साथ जो समझौता किया गया था, उसे असंदिग्ध रूप से रद्द करने के लिए साथ जो समझौता किया गया था, उसे असंदिग्ध रूप से रद्द करने के लिए विवश कर दिया।

अन्तर्राष्ट्रीय साम्यवाद इस समय पुनर्जन्म की प्रसव वेदना से गुजर रहा है। किन्तु अभी भी यह बताना सम्भव नहीं है कि जो शिशु होगा, वह मृत होगा या जीवित। मेरे जैसे व्यक्तियों की तो यही हार्दिक इच्छा है कि अन्तोगत्वा इसका परिणाम शुभ हो, सुखद हो।

रूसी मुकदमे और हत्याएं

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हमारे जो प्रत्यक्ष अनुभव थे, उनके अतिरिक्त लगभग उसी समय स्वयं सोवियत रूस में कुछ ऐसी दूसरी घटनाएं घट रही थीं, जिन्होंने मेरी विचार-सरणी को बहुत अधिक प्रभावित किया। ये घटनाएं थीं रूस के उन प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेताओं पर चलाये गये कुख्यात मुकदमे, जिनकी रचनाओं को मैंने बड़ी उत्सुकता के साथ घोलकर पी डाला था और जो मेरे लिए महान् क्रांतिकारी शूर-वीर थे, जिन्होंने लेनिन के अति विश्वासपात्र साथियों के रूप में इतिहासप्रसिद्ध महान् क्रांति की थी।

इन मुकदमों के विवरण के साथ-साथ कालान्तर में जिस अन्यायपूर्ण शासन ने रूस को जकड़ रखा था, उसके सम्बन्ध में ऐसे व्यक्तियों के द्वारा जिन्हें मैं ईमानदार समझता था, अध्ययन करके लिखी हुई चीजें भी आयीं। यूजीनलियनस की एसाइनमेन्ट इन युटोपिया जो मेरे विचार से एक उत्कृष्ट साहित्य रचना है, उन प्रारम्भिक रचनाओं में से एक है, जिसने मेरे मन को उद्वेलित कर दिया। तत्पश्चात् दूसरे विवरण प्राप्त हुए। जाॅन डुई ने ट्राटस्की के मामले की छानबीन की। उनके जो निष्कर्ष थे, उन्हें झुठलाना असम्भव था। कामेनेव, जाईनोवियफ, राडेक, रिकोव, बुखारिन आदि व्यक्तियों के विरूद्ध लगाये गये आरोप और उनके द्वारा कही हुई अपराध स्वीकारोक्ति बेहद बैचानी पैदा करती थी। कम्युनिस्ट नभोमण्डल के अन्य और कुछ अल्प प्रकाशवाले सितारों की भी वही भयंकर दुर्गति हुई। क्रुश्चेव ने अब कुछ ऐसे मुकदमों की निन्दा की है, जिनमें उसका हाथ नहीं था। मुझे इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि सोवियत रूस में जैसे-जैसे स्वतंत्रता का प्रसार होता जायगा, दूसरे कम्युनिस्ट नेता दूसरे-दूसरे अत्याचारों का भाण्डाफोड़ करेंगे और एक दिन आएगा, जब ट्राटस्की तक को पुनः उसी आदर के स्थान पर बिठा दिया जाएगा, जिसका वह अधिकारी था।

मार्क्सवाद का पुनः परीक्षण

इन सब घटनाओं और अनुभवों ने मुझे माक्र्सवाद के बुनियादी सिद्धान्तों की पुनः जांच करने के लिए मजबूर कर दिया। समाजवादी आंदोलन के मरे अधिकांश सथी पुनश्चिन्तन् की उस कष्टसाध्य प्रक्रिया से परिचित हैं, क्योंकि हम साथ-साथ ही उस दौर से गुजरे है। सैद्धान्तिक पुनश्शिक्षण की इस प्रक्रिया का कांग्रेस समाजवादी दल और तत्पश्चात पुराने समाजवादी दल के विकास और प्रगति पर गहरा प्रभाव पड़ा।

कांग्रेस समाजवादी दल का संगठन एक माक्र्सवादी-लेनिनवादी गुट के रूप में हुआ था। प्रारम्भिक काल में हम हमेशा यह दावा किया करते थे कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और क्रेमलिन दोनों भारतवर्ष में खास तौर से तथा विश्व की स्थिति में आम तौर से माक्र्सवादी लेनिनवाद का मिथ्या प्रयोग कर रहे है। किन्तु अब मेरे मन में एक गंभीर प्रश्न खड़ा हो गया, माक्र्सवाद-लेनिनवाद का कुछ भी अर्थ किया जाय, फिर भी क्या वह सामाजिक क्रांति ओर समाजवाद की स्थापना के लिए एक स्वयंपूर्ण और सुरक्षित मार्गदर्शक हो सकता है? हिंसा क्रांति की पोषिका है, यह मान्यता यदि पूरी तरह नहीं मिटी थी, तो भी कम-से-कम इतना तो मुझे साफ दिखाई देता थाः

(क) एक ऐसे समाज में, जहां गणतान्त्रिक ढंग से सामाजिक परिवर्तन करना लोगों के लिए संभव था, हिंसक तरीकों को अपनाना क्रांति के विरूद्ध कार्य है।

(ख) गणतांत्रिक स्वतंत्रताओं के अभाव में न तो समाजवाद की सृष्टि हो सकती है और न उसका रक्षण ही। इस तर्क के आधार पर मैंने सर्वहारा की तानाशाही के सिद्धान्त को व्यवहार में, जिसका अर्थ मुट्ठीभर अफसरों की तानाशाही होता है, अमान्य कर दिया।

रूसी क्रांन्ति एक जन-क्रांति के रूप में आरम्भ हुई थी, जिसे जाॅरशाही रूस की विस्तृत जनता का सक्रिय समर्थन प्राप्त था। किन्तु जब लेनिन ने संविधान सभा को , जिसमें वह एक बड़े अल्पमत में था, बलपूर्वक भंग कर दिया और विद्रोही सिपाहियों तथा शहरी मजदूर-वर्ग की सहायता से सत्ता पर कब्जा कर लिया, तो उसने इस जन क्रांति को अल्पसंख्यकों की क्रांति में बदल डाला। क्रांति की बादवाली असफलता और समाजवाद की विकृति मेरे ख्याल से एक अल्पमत के द्वारा बलपूर्वक सत्ता-अपहरण के प्रत्यक्ष परिणाम थे।

इस प्रकार मैं इसी नतीजे पर पहुंचा कि जहां जनता में लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं का अभाव हो, वहां भी हिंसक क्रांति के लिए लोकप्रिय समर्थन मिलना चाहिए और क्रांतिकारी सरकार के लिए जनता के बहुमत का आधार होना चाहिए। वैधानिक चुनावों की अपेक्षा क्रांति के दौरान में लोकेच्छा की अभिव्यक्ति आसान होती है। सामाजिक क्रांति में लोकेच्छा क्या है, इसका पता लगाने की पूर्ण स्वतंत्रता और गणतंत्र के पक्ष में ही होती है। जान-बूझकर तानाशाही स्वीकार करने की वृत्ति उनमें हरगिज नहीं होती। कम्युनिस्टों ने लेनिन की प्रतिभाशाली प्रेरणा पाकर अपने कुटिल साधनों से सर्वत्र जनता के उपर अपने अल्पमत और तानाशाही शासन को मढ़ने का प्रयत्न किया है। चीन में शायद इसका अपवाद हमें मिले। वहां च्यांगकाई शेक की अपेक्षा माओ-त्से-तुंग के पक्ष में एक बड़ा जन-समुदाय दीख पड़ता है। यद्यपि उसका यह अर्थ नहीं है कि चीनी सरकार एक तानाशाही सरकार नहीं है। कदाचित वह एक बहुमत की अल्पमत के उपर तानाशाही है। और भी, शायद यूगोस्लाविया में ऐसा है। अन्यत्र कम्युनिस्ट राज्य एक अल्पमत का राज्य ही है। किन्तु अल्पमत में हो या बहुमत में, जहां कहीं कम्युनिस्ट सत्तारूढ़ हैं, उन्होंने निरपवाद तानाशाही की स्थापना की है, उसे वे अपनी सामान्य दुमानी भाषा में जनता का राज्य अथवा समाजवादी प्रजातंत्र तक कह डालते है। इन सबने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचा दिया कि समाजवाद का रास्ता किसी प्रकार की भी तानाशाही से नहीं गुजरता।

सोवियत अनुभव ने मेरे लिए यह बात और भी स्पष्ट कर दी कि समाजवाद पूंजीवाद का अभाव मात्र नहीं हैं। यह सम्भव है कि पूंजीवाद नष्ट हो जाय, उद्योग, वाणिज्य, बैंक-व्यवस्था, कृषि आदि सबका राष्ट्रीकरण और सामूहीकरण हो जाय और फिर भी समाजवाद बहुत दूर ही रह जाय। समाजवाद बहुत दूर रह जाय, इतना ही नहीं, बल्कि यह भी सम्भव है कि बिल्कुल उसके विरूद्ध ही चला जाय। सोवियत रूस में हमने केवल ‘औपचारिक’ स्वतंत्रता का निषेध देखा। अफसरशाही शासकों के एक नये वर्ग की वृद्धि तथा शोषण के नये-नये रूप भी हमने देखे। यह सब समाजवाद का अभावमात्र नहीं था, बल्कि उसका निषेध भी है।

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