दस्तावेज़|Shortlink: 2010/01/15 9:26 pm

भारत में ‘अपग्रेडेशन ‘ की परम्परा

लेखक :धर्मनारायण शर्मा
अति प्राचीनकाल से भारत में नीचे को ऊंचा उठाने का कार्य चलता हैं। मैं नीचा यह मनोविज्ञान व्यक्ति और जाति में हीनता का भाव निर्माण करता है। हीनता को धारण करने वाला उच्चता की ओर कम ही अग्रसर हो पाता है। इसी बात को ध्यान में रखकर भारतीय मनीषियों ने ऐसे समूह को विशिष्ट नाम, विशिष्ट गोत्र देकर अनेक बार उच्च बनाया है।
सत्यकाम जाबाल, जाबाली के पुत्र थे। गौतम ऋषि के आश्रम में विद्याध्ययन हेतु गए तो उनके पिता का नाम व गोत्र पूछा गया। बालक बता नहीं सका। मां से पूछा कि मेरे पिता का नाम व मेरा गोत्र बताइये? मां ने पुत्र से कहा कि ऋषि को बताना कि मेरी मां अनेक पुरूषों को प्रसन्न करती रही थी इस कारण पिता व गोत्र बताना कठिन है। हां मेरी मां जाबाली है, उसका पुत्र मैं जाबाल हूं। ऋषि के पास जाकर बालक ने निःसंकोच वही बताया जो मां ने कहा था। ऋषि ने सुना तो कहा कि तुमने सत्य बोला है इसलिए तुम निश्चित ही ब्राह्मण की संतान हो। ऋषि ने बालक को अपने आश्रम में विद्याध्ययन हेतु प्रवेश दे दिया। आगे चलकर यही बालक सत्यकाम जाबाल के रूप् में पहचाना गया। ऋषि गौतम ने बालक को ब्रह्मज्ञान देकर ऋषि बनाया। कहां तो दासी पुत्र और कहां जाबाली ऋषि? ऋषि सन्त परम्परा उठाने की थी। हीनता नहीं, उच्चता, श्रेष्ठता निर्माण करना यह परम्परा पुराणों में परिलक्षित होती है।
लोक चर्चा है कि ब्रह्मा ने एक बार पुष्कर तीर्थ में यज्ञ करने की सोची। यज्ञ भूमि का चयन किया गया। यह भूमि ऊंची-नीची थी। ब्रह्मा ने ओड़ जाति के श्रमिकों को लगाया। ये श्रमिक अपने बैल, घोड़े, गधे लेकर भूमि को खोदकर मिट्टी ढोते रहे। एक अच्छी यज्ञशाला का निर्माण हो गया। यज्ञ भी श्रेष्ठता से पूर्ण हुआ। ब्रह्मा ने ब्राह्मण पंडितों को दक्षिणा देकर संतुष्ट किया। इसी समय ब्रह्मा ने एक विशेष घोषणा की जिन लोगों ने यज्ञशाला-निर्माण में श्रमिक रूप् में कार्य किया था उन्हें ब्राह्मण घोषित किया। ब्रह्मा द्वारा घोषित वे सभी व्यक्ति राजस्थान में आज भी पुष्करणा ब्राह्म्ण के नाम से जाने जाते है। यह भगवान् ब्रह्मदेव द्वारा एक प्रकार का अपग्रेडेषन था। नीचे को उंचा उठाओ और समाज में उनको आदर का पात्र बनाओ।
गुजरात में यह किवदन्ती है कि देसाई ब्राह्मणों को ब्रह्मत्व प्रदान करने का कार्य भगवान् श्रीराम ने किया है। मर्यादा पुरूषोत्तम जब वनवासी राम बनकर भ्रमण कर रहे थे उस समय उन्हें कोई अनुष्ठान करना था, पर उस समय वन क्षेत्र में कोई ब्राह्मण उपलब्ध नहीं था। भगवान् ने कुछ व्यक्तियों को ब्राह्मण घोषित कर उनके द्वारा अनुष्ठान पूर्ण करवाया। भगवान् श्रीराम द्वारा घोषित होने के कारण उन्हें मान्यता मिल गई। आज गुजरात में इन्हें सम्मानित स्थान प्राप्त है।
शास्त्रकारों का मत है कि भगवान परषुराम ने जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वी कष्यप् ऋषि को समर्पित कर दी थी। जब सम्पूर्ण पृथ्वी कष्यप् की हो गई तो ऋषि ने परषुराम से कहा िकइस पृथ्वी पर क्यों खड़े हो? सम्पूर्ण पृथ्वी तो मेरी है। भगवान् परषुराम ने कहा भगवान् मैं हां जाउूं? कहां रहूं? कहा जाता है कि श्री परषुराम ने अपना फरसा तेजी के साथ फेंका तो वह वर्तमान के केरल प्रदेष में जाकर गिरा। कुछ विद्वानों का मत है कि महेन्द्रपर्वत उड़ीसा में न होकर केरल में ही होना चाहिए। एक तो श्री कष्यप् ने श्री परषुराम को समुद्र के द्वीपों में रहने को कहा थ। दूसरा केरल में यह प्रसिद्ध है कि केरल प्रदेष को कृषियोग्य भगवान् परषुराम ने बनाया हैं। इसके साथ ही विद्वानों में यह भी चर्चा है कि भगवान् परषुराम ने केरल प्रदेष के नाविकों से प्रसन्न होकर उनमे ं ब्रहम्तेज के नाविकों से प्रसन्न होकर उनमें ब्रह्मतेज की सृष्टि की। इस तेज के परिणामस्वरूप वे सभी ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो गए। ऐसी मान्यता है कि केरल के नम्बूदरी ब्राह्मण भगवान परषुराम के तेज से ही ब्राह्मणत्व की श्रेष्ठता को प्राप्त हुए है। इन्हीं नम्बूदरी ब्राह्मणों में भगवान् आद्य शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ था। सारी सृष्टि में मानव का सृजन परमात्मा ने किया है। भगवान् व उनके अवतारों ने जिन्हें श्रेष्ठता प्रदान की वे आज भी श्रेष्ठता को प्राप्त है।
पुराणों में प्रसिद्धि है कि कभी राजस्थान में माउण्ट आबू पर्वत पर ऋषियों ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में से कुछ पुरूष प्रकट हुए जिन्हें अग्निवंशीय क्षत्रिय कहा जाता है। इस कथा का विष्लेषण करने वाले विद्वानों का मत है कि किसी कारण से समाज जीवन में क्षत्रियों की संख्या का हृास हो गया था। इस संकट को दखकर ऋषियों ने देष के वीरभावी पुरूषों को आबू पर्वत पर यज्ञ के अवसर पर एकत्रित किया। यज्ञ में क्षात्रत्व निर्माणकारी आहुतियां दी गई तथा प्रत्येक वीरभवी पुरूष को क्षत्रत्व भाव धारणकर देष, धर्म की रक्षा हेतु संकल्पबद्ध किया गया तथा ऐसे सभी पुरूषों को वीरवेषी बनाकर अलग-अलग गोत्र व वंष प्रदान किया गया एवं सभी को अग्निवंषीय क्षत्रिय घोषित किया। सूर्य, चन्द्रवंष के साथ अग्निवंषीय क्षत्रियों का प्रादुर्भाव हुआ। इन अग्निवंषीय क्षत्रियों का भी बड़ा ही गौरवषाली तथा वीरतायुक्त इतिहास पढ़ने को मिलता है। पृथ्वीराज चैहान को कौन नहीं जानता? वे अग्निवंषीय क्ष़ित्रय कुल के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण ने ‘‘चातुर्वण्र्यम् मयासृष्टम् गुण-कर्म-विभागषः’’ कहा है। सेवा यह शूद्र वर्ण का गुण कर्म माना गया है। आज बोलचाल में परिचय कराते हुए व्यक्ति बोलता है ‘मैं सरकारी सेवा में हूं, मै कंपनी की सेवा में हूं।’ क्या यह सेवा का गुणकर्म नहीं है? सभी प्राकर की सेवा, परायों की सेवा, सेवाधर्म में ही आती है पर ऐसे सेवाकर्मी को कोई भी मंंिदर में भगवान् की सेवा भी नहीं करता। सम्भवतः बालीद्वीप में आज भी एक घर में ही चतुर्वर्ण मिल जाएगा । घर का एक भाई सेना, प्रशासन में है तो उसे क्षत्रिय माना जाता है। जो शिक्षा, प्रवचन, उपदेश में लगा है तो वह ब्राह्मण है। जो व्यापार, उद्योग में रत है तो उसे वैश्य की संबा प्राप्त है और जो भाई सेवा कार्यो, नगर निगम आदि में लगा है तो उसके कर्म में शूद्र का गौरव प्राप्त है। चारों भाई एक ही घर में रहते है पर गुण कर्म भिन्न-भिन्न होने से भी भ्रातृत्व में कोई अन्तर नहीं है। यह गुण-कर्म है। गुण-कर्म द्वारा भेदसृष्टि नहीं होती। गुण-कर्मानुसार जब व्यक्ति कर्म करता है तो वह वहां स्वाभाविक उन्नति को प्राप्त होता है। गुण-कर्मानुसार कार्य का चयन होने पर व्यक्ति की प्रतिभा का विकास होता है तथा उसके हृदय में प्रसन्नता प्रस्फुटित होती हैं।
आज भी घर-घर के अंदर कोई डाक्टर है तो कोई इंजीनियर, कोई व्यापार/उद्योग में है तो कोई शिक्षा क्षेत्र में कार्य करता है। कोई घर का व्यक्ति सेना में नेतृत्व कर रहा है। गुण-कर्म के अनुसार व्यक्ति अपनी राह पकड़ता है। कर्मों में वर्तमान व भूतकर्म भी मानवी प्रवृत्ति का निर्माण करते हैं। हमें नहीं मालूम कि हम पूर्व जन्म में कौन थे तथा क्या करते थे? मनुष्य के जन्म जन्मान्तर के गुण-कर्म उसके साथ सम्बद्ध रहते है इस कारण कोई व्यक्ति साधु बनता है और कोई उद्योगपति। कभी-कभी तो यह देखने को मिलता है कि जीवन के एक काल तक व्यक्ति अभाव में था। किन्हीं कारणों से इस या उस कार्य में संघर्श कर रहा था, परन्तु एक काल आता है उस व्यक्ति की प्रवृत्ति में परिवर्तन होता है। उसमें कुछ विषेष करने की कामना जागृत होती है और वह समय के घोड़े पर सवार होकर अपने स्वाभिाविक गुण-कर्म की ओर प्रवृत्त होकर उंचाइयां प्राप्त कर लेता हैं। न जाति का बन्धन न ग्राम का बन्धन उसे रोक पाता है, वह तेजी से अपने स्वाभाविक गुण-कर्म की सृष्टि करने लगता है। सैकड़ों मानवों के उदाहरण विद्यमान है जिन्होंने शून्य में से भव्य सृष्टि का निर्माण किया है तथा ऐसे भी उदाहरण प्राप्त है कि सब प्रकार के साधन-सम्पदा के होने पर पूर्व जन्म की कर्म सम्पदा चूक जाने के कारण पुनश्च शून्य में समाविष्ट हो गए है। यह है गुण-कर्म का परिणाम। हम माने न माने यह होकर ही रहता है।
आज बढ़ई के कार्य करने वाले अपने को जांगिड़ ब्राह्मण कहते है। उन सभी की गोत्रें ब्राह्मणों की है। किसी काल में ये भी लकड़ी का कार्य करने लगे होंगे। एक परम्परा यह यल पड़ी। इन्हें बढ़ई नाम से सम्बोधित करने लगे। क्रमश : ये सभी एक जाति में परिणित हो गए। छोटे-छोटे कारणों से , कभी तो हास्यास्पद कारणों से व्यक्तियों या व्यक्ति समूह को जाति से बहिष्कृत किया गया है। जाति बहिष्कृत होने से गोत्रों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। गोत्रें वही बनी रहीं। आज गोत्रे ही प्रमाण हैं। गोत्रों के आधार पर यदि वर्णों को पुनर्गठन किया जाता है तो अनेक पुनर्गठन पिछड़ी जातियां भी उच्चकुलीन वर्णों को प्राप्त हो जायेगी।
क्या ऐसा संभव होगा? आज तो संभव नहीं लगता है, क्योंकि वर्ण लगभग अब शून्य की ओर जा रहे हैं। वर्तमान में जातिवाद बढ़ा है। वोट की राजनीति इस वाद को भड़का रही हैं सत्ताप्राप्ति की ललक भड़की हुई है। कोई भी सत्य का सामाना करने को तैयार नहीं हैं वर्णरचना अपना वर्तमान स्वरूप खोयेगी तथा आगे चलकर कोई रूप लेगी या नहीं कहना कठिन है। मानव जीवन में बुद्धि-बल, शरीर बल, धनबल व श्रमबल की अनिवार्यता हैं बुद्धि, शौर्य, श्रम एवं अर्थ के संयोग से ही नवनिर्माण होता है। किसी एक बल से कार्य सम्भव नहीं है तथा इन बलों में संघर्ष से भी कोई भी सृजन संभव नहीं है। सहयोग, समन्वय, सहकार्य एवं एकात्म भाव से ही संसाररूपी गाड़ी चलती है।
टाज अनेक जातियां उच्चासन पर आने को उत्सुक है। वे अपने नाम-रूप को बदलकर उच्चासन की ओर अग्रसर हो रही है। इस प्रवृत्ति का स्वागत करते हुए उनको उच्चकुलों में विलीन करना चाहिए। ‘न हिन्दुः पतितों भवेत्’, इस महावाक्य को आधार बनाकर समाज के लाखों, करोड़ों बन्धुओं को उच्चजातियों में समाविष्ट कर लेना चाहिए। तथाकथित प्रयत्नशील जातियां बिना ठहरे अपना प्रयास चालू रखें। समय के साथ नई पहचान बनेगी और विवाह एवं व्यवहार भी आरम्भ होने लगेंगे। व्यापार, व्यवसाय के साथ नई पीढ़ी को उच्चषिक्षा द्वारा षिक्षित बनाने का कार्य चलता रहा और षिक्षा के कारण भी उच्च पदों तक पहुंचे तो यह कार्य और सरल हो जायेगा। आज अर्थ व अर्थ के साथ जीवन स्तर का महत्व है। सुखी व स्तरयुक्त को स्वीकार करने लगे हैं। प्रेम विवाह के पीछे जहां वासना विषय हैं वहीं जीवनस्तर का आकर्षण भी कारण है। यह क्रम चल पड़ा है इसलिए जाति बन्धन भी ढ़ीले हो रहे है। आनेवाले समय में अर्थ और जीवनस्तर उच्चता का मापदण्ड बनेगा। सभी दृष्टि से उच्चस्तर की आरे बढ़ने का प्रयास उपयुक्त है। प्राचीन समय में उच्चत्व प्राप्त करने की ललक दिखाई देती है। वही भाव आज भी प्रबल हो रहा है, यह भाव शुभ है और निश्चित ही सफल होगा।

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