दस्तावेज़|2011/01/23 10:22 pm

खेतिहरों की घटती आय का संकट

• दिहाड़ी मजदूरों सहित हर श्रेणी के कामगार के मेहनताने की बढोतरी दर साल 1983-1993 की तुलना में 1993-94 से 2004-05 के बीच घटी है। #

 

• साल 1983 से 1993-94 के बीच रोजगार की बढ़ोतरी की दर 2.03 फीसदी थी जो साल 1993-94 से 2004-05 के बीच घटकर 1.85 हो गई। साल 1993-94 से 2004-05 के बीच कामगारों के मेहनताने की बढ़ोतरी दर और आमदनी में भी पिछले दशक की तुलना में ठीक इसी तरह कमी आई।

 

 

• साल 1993-94 और 2004-05 के बीच खेतिहर मजदूरी का स्तर बहुत कम रहा है और इस पूरे दशक में इनकी बढ़ोतरी की दर कम हुई है।*.

 

 

• सीमांत किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी बड़े किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी से बीस गुना कम है। *

 

 

• जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है वे अपने परिवार का गुजारा खेती से होने वाली आमदनी के सहारे नहीं कर पा रहे। *

 

 

• ग्रामीण इलाके की महिलाओं को मिलने वाली मजदूरी ग्रामीण इलाके के पुरुषों को मिलने वली मजदूरी से 58 फीसदी कम है। **

 

 

 

• शहरी इलाकों की महिलाओं को शहरी पुरुषों की तुलना में 30 फीसदी कम मेहनताना मिलता है। **

 

 

 

• ग्रामीण इलाके के पुरुषों को शहरी इलाके के पुरुषों की तुलना में 48 फीसदी कम मेहनताना हासिल होता है। **

 

 

 

# द चैलेंजेज ऑव एमप्लायमेंट इन इंडिया-एन् इन्फॉरमल इकॉनॉमिक पर्सपेक्टिव, खंड-एक, मुख्य रिपोर्ट, नेशनल कमीशन फॉर इन्टरप्राइजेज इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस)अप्रैल,2009

* नेशनल कमीशन फॉर इन्टरप्राइजेज इन द अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस-2007), रिपोर्ट ऑन द कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर ।

** इम्पलॉयमेंट एंड अन-इम्पलॉयमेंट सिचुएशन इन इंडिया 2005-06, नेशनल सैम्पल सर्वे,62 वां दौर।

 

 

 

 

 

एक नजर

 

 

 

हिन्दुस्तानी के गांवों में जाइए तो बहुत संभव है जो आदमी आपको सबसे गरीब दिखाई दे वह या तो दलित होगा या फिर आदिवासी।वह या तो भूमिहीन होगा या फिर उसके पास नाम मात्र के लिए थोड़ी जमीन होगी। गंवई इलाकों के ज्यादातर गरीब लोग ऐसे खेतिहर इलाकों में रहते हैं जो आज भी सिंचाई के लिए बारिश के पानी के आसरे है।ऐसे इलाकों में उन्हें ना तो बिजली की सुविधा हासिल है और ना ही बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं तक ही उनकी पहुंच बन पायी है। रोजगार का कोई वैकल्पिक जरिया भी मय्यसर नहीं है।भुखमरी की हालत से बचने के लिए लाखों लोग दूर-दराज पलायन करने पर मजबूर होते हैं। शुष्क या फिर कम नमी वाले इलाकों में तो हालत और भी गंभीर है। ऐसे इलाकों में जब ना तब सूखा पड़ना एक सामान्य सी बात है और ऐसे इलाकों में खेती से होने वाली वास्तविक आय लगातार कमती जा रही है।एक तो आमदनी कम उसपर सितम बढ़ती हुई बेरोजगारी और खस्ताहाल बुनियादी सेवाओं मसलन-स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा, पेयजल और साफ-सफाई का। सूरते हाल ऐसे में काफी गंभीर हो जाती है।(अगर नरेगा के अन्तर्गत हासिल रोजगार को छोड़ दें तो 15 साल से ज्यादा उम्र के केवल 5 फीसदी लोगों को ही सरकारी हाथ से कराये जा रहे कामों में रोजगार हासिल है) राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों से जाहिर होता है कि गंवई इलाकों में नकदी रोजगार बड़ा सीमित है। आश्चर्य नहीं कि साल 1983 में ग्रामीण पुरुषों में 61 फीसदी स्वरोजगार में लगे थे लेकिन साल 2006 में यह अनुपात घटकर 57 फीसदी हो गया।

 

 

बैकग्राऊंडर के इस खंड में जिन रिपोर्टों और आंकड़ों को उद्धृत किया गया है उससे पता चलता है कि ग्रामीण इलाकों में लोगों की आमदनी सालदर-साल कम हो रही है।भारत में खेती आज घाटे का सौदा है।ग्रामीण इलाके का कोई सीमांत कृषक परिवार खेती में जितने घंटे की मेहनत खपाता है अगर हम उन घंटों का हिसाब रखकर उससे होने वाली आमदनी की तुलना करें तो आसार इस फैसले पर पहुंचने के ज्यादा होंगे कि इस परिवार को तो एक लिहाज से न्यूनतम मजदूरी भी हासिल नहीं हो रही है। एनसीईयूस (2007) की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 40 फीसदी किसानों का गुजारा खेती से होने वाली आमदनी भर से नहीं तल पाता और उन्हें अपने भरण-पोषण के लिए दिहाड़ी मजदूरी भी करनी पड़ती है, खेती से ऐसे किसान परिवारों को कुल आमदनी का 46 फीसदी हिस्सा ही हासिल हो पाता है।इन सबके बावजूद सीमांत किसान शायद ही दो जून की भरपेट रोटी, तन ढंकने को कपड़ा और सर पर धूप-बारिश झेल सकने लायक छत जुटा पाता है।

 

 

जिन किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम की जमीन है वे अपने परिवार की बुनियादी जरुरतों को भी पूरी कर पाने में असमर्थ हैं। एनसीईयूएस की रिपोर्ट के मुताबिक एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च 2770 रुपये है जबकि खेती सहित अन्य सारे स्रोतों से उसे औसतन मासिक 2115 रुपये हासिल होते हैं, जिसमें दिहाड़ी मजदूरी भी शामिल है यानी किसान परिवार का औसत मासिक खर्च उसकी मासिक आमदनी से लगभग 25 फीसदी ज्यादा है। यही कारण है कि ग्रामीण इलाकों में बहुत से परिवार कर्ज के बोझ तले दबे है।

नेशनल कमीशन ऑन एम्पलॉयमेंट इन अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर(एनसीईयूएस) के दस्तावेज रिपोर्ट ऑन कंडीशन ऑव वर्क एंड प्रोमोशन ऑव लाइवलीहुड इन द अन-आर्गनाइज्ड सेक्टर के अनुसार-

 

http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf:

 

 

 

· भारत के ग्रामीण इलाके में खेती से होने वाली आमदनी का हिस्सा ४६ फीसदी है जबकि मजदूरी से होने वाली आमदनी का हिस्सा भी काफी बड़ा यानी ३९ फीसद है।ग्रामीण भारत के बारे में एक तथ्य यह है कि कुल किसान परिवारों में ४५ फीसद के पास १ हेक्टेयर से भी कम जमीन है।इसी कारण ग्रामीण इलाकों में किसान परिवारों की कुल आमदनी का एक बड़ा हिस्सा मेहनत-मजदूरी से आता है ना कि खेतिहर उपज से।एक हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवार भरण-पोषण के लिए खेती के साथ-साथ मजदूरी पर भी निर्भर हैं।

 

 

 

· राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो खेती से होने वाली मासिक आय ९६९ रुपये है।इस आकलन में भूमि के हर वर्ग यानी सीमांत से लेकर बड़े किसानों तक को शामिल किया गया है। सीमांत किसान की खेती से होने वाली मासिक आमदनी ४३५ रूपये है जबकि बड़े किसान की ८३२१ रुपये।

 

 

 

· सीमांत किसान की औसत आमदनी बड़े किसान की औसत आमदनी से बीस गुना कम है।

 

 

 

· चूंकि छोटे और सीमांत किसानों की संख्या बहुत ज्यादा और आमदनी बहुत कम है इसलिए हर भूमि-वर्ग के किसानों को एक साथ मिलाकर खेती से होने वाली मासिक आमदनी का आकलन राष्ट्रीय स्तर पर करने पर आमदनी का औसत कम आता है।

 

 

 

· खेती के साथ-साथ आमदनी के बाकी स्रोतों को भी मिला दें तो राष्ट्रीय स्तर पर एक किसान परिवार की मासिक आमदनी २११५ रुपये आती है और इस आमदनी को प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें तो राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा महज ३८५ रूपये मासिक का आता है।अलग-अलग भूमि-वर्ग के किसान परिवारों के बीच मासिक आमदनी का अन्तर भी बहुत ज्यादा है।एक हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी जहां १३८० रूपये है वहीं १० हेक्टेयर और उससे ज्यादा की मिल्कियत वाले किसान परिवार की औसत मासिक आमदनी ९६६७ रुपये है।

 

 

 

· खेती के अतिरिक्त बाकी अन्य स्रोतों से होने वाली आमदनी को एक साथ करें तो सबसे ज्यादा मासिक आमदनी जम्मू-कश्मीर के किसान परिवारों की(लगभग ५५०० रुपये) है।इसके बाद नंबर आता है पंजाब(४९६० रूपये) और केरल का(४००४ रूपये) ।सबसे कम मासिक आमदनी(१०६२रूपये) उड़ीसा के किसान परिवारो की है।कम आमदनी वाली किसान परिवारों में मध्यप्रदेश का स्थान दूसरा(१०६२ रूपये) और राजस्थान का तीसरा(१५०० रूपये) है।

 

 

 

· किसान-परिवारों के मामले में जहां तक औसत खर्च का सवाल है,जमीन के बढ़ते आकार के साथ-साथ इसमें इजाफा होता देखा गया है।बड़े किसान की कोटि में आने वाले परिवारों का औसत मासिक खर्च ६००० रुपये से ज्यादा है।राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक किसान परिवार का औसत मासिक खर्च २७७० रूपये और औसत मासिक आमदनी २११५ रूपये है।इससे संकेत मिलते हैं कि किसान परिवारों की औसत मासिक आमदनी से उनका औसत मासिक खर्च कहीं ज्यादा है- छोटे और सीमांत किसान परिवारों पर यह बात विशेष रूप से लागू होती है।

 

 

 

· आकलन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जिन किसान परिवारों के पास २ हेक्टेयर से कम जमीन है उनकी मासिक आमदनी उनके मासिक खर्चे से कम है।दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान परिवार अपने भरण पोषण के लायक आमदनी नहीं जुटा पा रहे हैं।

 

 

 

· कुल मिलाकर देखें तो,खेतिहर मजदूरों को मिलने वाली मजदूरी बहुत कम है और इस मजदूरी में १९९३-९४ से लेकर २००४-०५ के बीच यानी एक दशक में बढ़ोत्तरी की दर बढ़ने के बजाय घटी है।

 

 

 

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण यानी नेशनल सैंपल सर्वे के ६२ वें दौर की गणना के दस्तावेज एंप्लायमेंट एंड अन-एंप्लायमेंट सिचुएशन इन इंडिया(२००५-०६) के अनुसार-

 

 

· ग्रामीण इलाके में नियमित मजदूरी या वेतन पाने वाले मजदूर अथवा कर्मचारी को,अगर वह पुरूष है तो औसतन १३८ रुपये ७४ पैसे और महिला है तो ८७ रुपये ७१ पैसे मिलते हैं यानी पुरूष और महिला के बीच मेहनताने में अंतर लगभग ५० रूपये का है।शहरी इलाके में मजदूरी कहीं ज्यादा है।शहरी इलाके में नियमित मजदूरी पर बहाल पुरूष को २०५ रूपये ८१ पैसे हासिल होते हैं जबकि स्त्री को १५८ रूपये २३ पैसे यानी शहरी इलाके में दिहाड़ी पर काम करने वाली स्त्री को पुरूष की तुलना में यहां भी रोजाना लगभग ५० रूपये कम मिलते हैं।

 

· सरकार द्वारा चलाये जा रहे लोक-कल्याण के कामों में पुरूष को बतौर मजदूरी औसतन ५६ रूपये हासिल होते हैं जबकि महिला को ५४ रूपये।

 

साभार : मीडिया फॉर चेंज

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