बलात्कारी को कठोर सजा देने की वकालत करते हुए एक महिला न्यायाधीश ने यह प्रश्न उठाया है कि क्यों न बलात्कारी को नपुँसक बना दिया जाय? (इस तरह के प्रश्न पहले भी उठाये जाते रहे हैं, मगर अफसोस कि ‘जन-जागृति’ नहीं फैलती, जिसके चलते ऐसे कानून नहीं बन पाते।)
मैं इस विचार का समर्थन करता हूँ। देश की महिलायें इसका समर्थ करेंगी। जानता हूँ- ज्यादातर पुरूष भी समर्थन करेंगे। मगर कुछ चवन्नी छाप दाढ़ी रखने वाले, कुछ मातृभाषा बोलने में लज्जा महसूस करने वाले, कुछ बारहों महीने टाई बाँधने वाले (इस ग्रीष्मप्रधान देश में भी!), कुछ खुद को इलीट कहलाना पसन्द करने वाले, टी.वी. चैनलों पर इस तरह की सख्त सजा के खिलाफ कमर कसकर मोर्चा खोल देंगे- यह भी मैं जानता हूँ।
मैं तो इससे भी एक कदम आगे बढ़ते हुए कहना चाहूँगा कि बलात्कारी को जेल में रखकर उसे नियमित रुप से “स्त्री हार्मोन” के इंजेक्शन दिये जाने चाहिए; और जब उसका पूरी तरह “लिंग-परिवर्तन” हो जाये, तब उसे एक नयी पहचान के साथ रिहा कर देना चाहिए। “नारी” की इस नयी पहचान के साथ अब वह समाज में जीना चाहे या न चाहे- यह उसकी मर्जी।
कुछ कहेंगे- यह तो प्रकृति के खिलाफ जाने वाली बात हो गयी। मैं कहूँगा- बलात्कार, समाज का जघन्यतम अपराध है, इसके खात्मे के लिए कुछ कदम प्रकृति के खिलाफ भी उठाने पड़े, तो कोई हर्ज नहीं!
एक महत्वपूर्ण बात और है- अदालत में बलात्कारी का बचाव करने वाले तथा पीड़िता को बदचलन बताने वाले या उसे सहमत बताने वाले वकीलों का क्या? उनके खिलाफ तो कानूनन कुछ किया नहीं जा सकता। फिर? क्या उनका “सामाजिक बहिष्कार” न किया जाय??
(क्रमशः। कल मैं बलात्कार तथा नारी-उत्पीड़न के मामलों के लिए न्यायिक प्रक्रिया का खाका प्रस्तुत करना चाहूँगा- कि यह ऐसा होना चाहिए।)


काश, ऐसा हो जाए….