दो-टूक|2012/02/21 12:21 pm

बलात्कार आदि मामलों के लिए न्यायिक प्रक्रिया: एक सुझाव

बलात्कारकल बलात्कार की सजा के रुप में बलात्कारी को “नपुँसक” बनाये जाने, या उसका “लिंग-परिवर्तन” किये जाने पर बात हुई थी। आज बलात्कार तथा यौन-उत्पीड़न-जैसे मामलों की सुनवाई कैसे होनी चाहिए इस पर कुछ सुझाव प्रस्तुत है-

1. ऐसे मामलों को “बन्द अदालतों” में चलाया जाना चाहिए। हालाँकि हमारा मीडिया शालीनता बरतते हुए “नाम बदलकर” ही समाचार देता है और चित्रों में चेहरे को धुँधला बनाकर दिखाता है; फिर भी, “खुली अदालतों” में इन मामलों का चलना अशोभनीय है।

2. इन मामलों में (12 सदस्यीय) “ज्यूरी” का होना “अनिवार्य” किया जाना चाहिए और ज्यूरी के मत को ध्यान में रखते हुए न्यायाधीश को निर्णय देना चाहिए। ज्यूरी में अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता, मनोविज्ञानी, पुलिस अधिकारी, वकील, डॉक्टर तथा पत्रकार के रूप में छह महिला और छह पुरूष सदस्य होने चाहिए।

3. अदालत में पीड़िता स्त्री द्वारा एक बार अपराध में अपनी “असहमति” या अपने समर्पण को किसी किस्म की “मजबूरी” बताये जाने के बाद इसे ग़लत साबित करने के लिए बहस या जिरह बिलकुल नहीं होनी चाहिए।

4. बहस या जिरह क्यों नहीं होनी चाहिए- इसका जवाब यह है कि एक पुरूष को “अपनी पत्नी” या “नगरवधू” (Commercial Sex Workers) के अलावे किसी और के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने (या ऐसी कोशिश करने) का अधिकार ही नहीं है! अगर कोई ऐसा करता है, तो वह “दण्ड का भागी” है। स्त्री पहले सहमत होकर बाद में अदालत में अगर अपनी असहमति दर्ज कराती है, तो भी पुरूष को दण्ड मिलना चाहिए!

5. अगर स्त्री अपनी सहमति की बात स्वीकार करती है- जैसा कि “लिव-इन” रिश्तों में हो सकता है- तो फिर यह “अनैतिकता” का मामला बन जाता है और जब तक कोई “तीसरा पक्ष” शिकायत दर्ज न कराये, अदालतों को इन मामलों को नजरअन्दाज करना चाहिए। कहने का तात्पर्य, दो बालिगों के सहमतिपूर्ण सम्बन्धों पर भी अगर किसी तीसरे पक्ष को आपत्ति है, तो उसे शिकायत दर्ज कराने का अधिकार होना चाहिए; अदालतों को भी इन “अनैतिक” मामलों की सुनवाई करनी चाहिए तथा आरोपितों को जरूरी सुझाव (जैसे विवाह) या चेतावनी देनी चाहिए; कुछ मामलों में जुर्माने तथा कुछ में दोनों को कारावास तक की सजा देने की जरुरत महसूस की जा सकती है।

 

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