उत्तम सिंह (भारतीय स्टेट बैंक, लखनऊ)
शहर-ए-लखनऊ से आप सबको सुबह का सलाम क़बूल हो। आज के अख़बार में एक ऐसी ख़बर पढ़ीजिसे आप सब के साथ बांटना चाहता हूँ। इस ख़बर से ज़ाहिर होता है कि इन्सानियत आज भी किस तरह ज़िन्दा है।
यह ख़बर है शहर फ़ैज़ाबाद के एक बुज़ुर्ग साइकिल मिस्त्री मो. शरीफ़ साहब के बारे में, जिन्हें लोग प्यार और इज्ज़त से “शरीफ़ चचा” कहते हैं (फ़ैज़ाबाद से मेरा लगाव इसलिये भी है क्योंकि मैंने अपनीज़िन्दगी के ११ अहम साल इस उम्दा शहर में बिताये हैं)। तो बात शरीफ़ चचा की हो रही थी। १९९२ मेंशरीफ़ चचा के २२ साल के बेटे डॉ. मो. रईस की लाश को लावारिस समझ कर नदी में बहा दिया गया और रह गयी पहचान के लिये उनकी एक कमीज़। जब तक उस कमीज़ की शिनाख़्त की गयी, लाश का कोई अता पता नहीं रह गया था। चचा ने उस दिन से कसम खा ली कि अब से फ़ैज़ाबाद शहर में कोई लाश लावारिस नहीं रहेगी। १९९२ से अब तक इन १० सालों में चचा सैकड़ों हिन्दुओं का, श्री संतोष मिश्र की मदद से दाह संस्कार करवा चुके हैं और सैकड़ों मुसलमानों को दफ्न कर चुके हैं। सड़ीगली, कीड़े पड़ चुकी लाश को भी उठाने, नहलाने और बाइज्ज़त पूरे रीति रिवाज के साथ उसकाधर्मानुसार अंतिम संस्कार कराने वाले शरीफ़ चचा को लोगों ने “फ़ादर टेरेसा” कहना भी शुरु कर दिया।चचा ने यह काम अकेले शुरु किया था और फिर वही मसल हुई कि “मैं अकेला ही चला था जानिबेमंज़िल मगर, लोग साथ आते गये, कारवां बनता गया।” आज चचा के साथ कुछ और लोग भी हैं जो धन के ज़रिये उनकी मदद करते हैं, उनके साथ रह कर उनकी मदद करते हैं। चचा के पास चार रिक्शेवाले हैं जो लावारिस लाशों को उठाने में उनके सहायक हैं। शरीफ़ चचा को लोग एक ऐसी इज्ज़त की निगाह से देखते हैं जो बिरलों को ही नसीब होती है। अगर हम में से कोई उनसे बात करना चाहें तो उनका मोबाइल नं.09235853230 है। कई राजनीतिक पार्टियां अपने फ़ायदे के लिये उन्हें अपने साथ शामिल करना चाहती हैं, लेकिन चचा अपने काम से काम रखते हैं। ये राजनीतिज्ञ क्या समझेंगे उनके जज़्बात को ? चचा तो कभी कभी मृतक के घर वालों का पता चला कर उनके घर तक शव पहुंचा आते हैं। आज उनकी आयु ७० साल है लेकिन उनके जोश और जज़्बे में कोई कमी नहीं।
फ़ैज़ाबाद के चार जवानों, शारिक, अख़्तर, गुफ़रान और शाह आलम ने “राइज़िंग फ्रॉम द एशेज़” नाम से एक डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म भी उनके ऊपर बनायी है।
जहां फ़ैज़ाबाद से मात्र ७ किलोमीटर की दूरी पर स्थित अयोध्या को राजनीतिबाज़ों ने अखाड़ा बना कर रख दिया है, वहीं शरीफ़ चचा और संतोष मिश्र जी जैसी शख़्सियतें इन के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा मारती हुई हमारी हिन्दुस्तानी तहज़ीब और तमद्दुन की मिसाल हैं। मैं जिस वक्त इन पंक्तियों को लिखरहा हूं, मेरे अज़ीज़ दोस्तों, यकीन करिये, मेरी आंखें भर आयी हैं और मैं अपनी पूरी शख़्सियत केसाथ उस बेमिसाल ‘चचा’ को सलाम करता हूं।


क्षमा किया जाय, यह आलेख श्री उत्तम सिंह (भारतीय स्टेट बैंक, लखनऊ) का लिखा हुआ है. हमलोगों का एक “मेल-समूह” है, जिसमें हमलोग आपस में अपने विचार, आलेख इत्यादि साझा करते हैं. इसी क्रम में आज उत्तम जी का आज यह आलेख मेल में आया था. मैंने इसे “जनोक्ति” में अग्रेषित करते हुए अनुरोध किया था कि उत्तम जी की ओर से ही इसे प्रकाशित किया जाय, मगर अनजाने में यह मेरे नाम से ही प्रकाशित दीख रहा है. आशा है, जल्दी ही भूल सुधार हो जायेगा.
ईति.
आप दोनों ही लोगों ने बहुत अच्छा कार्य किया है, शरीफ चचा के नेक कार्यों को जग जाहिर कर…
चचा का तहेदिल से इस्तकबाल