मनरेगा के पीछे

नरेगा-मनरेगा नाम से चर्चित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना किस तरह एक राजनीतिक हथियार बनती जा रही है, इसका नया प्रमाण है केंद्र सरकार का वह निर्णय जिसके तहत इस योजना के प्रचार-प्रसार में और अधिक धन खर्च किया जाएगा। नरेगा सहित कुछ अन्य केंद्रीय योजनाओं के प्रचार में ज्यादा पैसा सिर्फ इसलिए खर्च किया जाएगा ताकि लोगों को यह बताया जा सके कि ये योजनाएं संप्रग सरकार की ओर से चलाई जा रही हैं, कि राज्य सरकारों की ओर से। स्पष्ट है कि केंद्र सरकार को यह पसंद नहीं कि उसकी योजनाओं पर गैर कांग्रेसी राज्य सरकारें वाहवाही लूटें, लेकिन क्या उसकी प्राथमिकता यह नहीं होनी चाहिए कि नरेगा और ऐसी ही अन्य योजनाओं का दुरुपयोग होने पाए? यदि राज्य सरकारें नरेगा के बेहतर क्रियान्वयन के साथ उसका श्रेय भी ले रही हैं तो यह कोई अपराध नहीं है। जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत राज्यों को यह सुविधा प्राप्त है कि वे नरेगा को अन्य किसी नाम से लागू कर सकते हैं तब फिर इसका कोई औचित्य नहीं कि केंद्र सरकार इसका ढिंढोरा पीटती फिरे कि यह तो उसकी अपनी योजना है। आखिर ऐसा भी नहीं है कि इस योजना के लिए कांग्रेस अथवा अन्य कोई राजनीतिक दल अपनी जेब से पैसा खर्च कर रहा हो। यह निराशाजनक है कि नरेगा की आंशिक सफलता से अभिभूत केंद्र सरकार इस योजना की खामियों पर गौर करने के लिए तैयार नहीं। इसके बजाय वह इस कोशिश में है कि इस योजना का अधिकाधिक लाभ कांग्रेस को मिले। इस तरह की चाहत में कोई बुराई नहीं, लेकिन आखिर नरेगा के पैसे से राजीव गांधी सेवा केंद्रों का निर्माण कराने का क्या मकसद? क्या इसलिए कि इसी बहाने पूर्व प्रधानमंत्री का नाम हो सके?

यह शायद नरेगा के जरिये राजनीतिक लाभ उठाने पर अधिक ध्यान देने का ही परिणाम है कि खुद ग्रामीण विकास राज्य मंत्री के इलाके में इस योजना का बुरा हाल है। हो सकता है कि इसके लिए राज्य सरकार भी जिम्मेदार हो, लेकिन यदि ऐसा है तो फिर केंद्र सरकार और विशेष रूप से उसके मंत्री किस मर्ज की दवा हैं? यदि केंद्र सरकार इस योजना को वास्तव में सफल बनाना चाहती है तो उसे इस पर भी ध्यान देना होगा कि मजदूरी करने वाले सदैव मजदूर ही बने रहें। मजदूरों को निर्धनता के दुष्चक्र से निकालने के लिए यह आवश्यक है कि वे केवल सौ दिन के रोजगार पर ही आश्रित रहें। नि:संदेह इसकी भी देखरेख होनी चाहिए कि नरेगा के जरिये तालाब-नहर खोदने जैसे काम सही तरह से हो रहे हैं या नहीं? इसके अतिरिक्त पंजाब सरीखे राज्यों की समस्या का भी समाधान खोजना होगा, क्योंकि यहां सौ रुपये में कोई काम करने के लिए ही तैयार नहीं। यह लगभग तय है कि पंजाब में यह योजना लक्ष्य से पीछे ही रहेगी। इधर यह भी देखने में रहा है कि केंद्र सरकार ऐसे कदम उठाने पर भी जोर दे रही है जो राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के प्रावधानों से मेल नहीं खाते। इस संदर्भ में यह किसी से छिपा नहीं कि इस कानून की रूपरेखा तैयार करने वाले अर्थशास्त्री और समाजसेवी केंद्र सरकार के रवैये से संतुष्ट नहीं।

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About सुमित श्रीवास्तव

सुमित श्रीवास्तव , बिहार की राजधानी पटना के निवासी है . तकनीकी शिक्षा ग्रहण करते हुए सामाजिक और राजनैतिक जीवन में प्रवेश करने वाले सुमित जी " विधायक जी " के नाम से लोकप्रिय हैं . विभिन्न संगठनों मसलन , गो इंडिया फाउनडेशन , एस एम् एस ब्लड इंडिया , धर्म रक्षा मिशन में काम करने वाले सुमित दुनिया के सबसे बड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् पटना महानगर के सह-मंत्री है .
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One Response

  1. मीडिया हाइप का जमाना है ! नरेगा से लेकर आरटीआई को इस तरह बढा-चढ़ा कर पेश किया गया जैसे मानों सारे दुःख दूर हो जायेंगे ? ना जाने कितनी योजनायें बनती है और फाइलों के माध्यम से चलाई जाति है जब ज्यादा पोल-पट्टी खुलने लगे तो एक समिति बना कर उसके सिफारिशों का हवाला देते हुए एक नई योजना बना दी जाती है जिसके मद में प्रदत्त राशि का ढिंढोरा पीट कर सत्ता का सफ़र दुबारा तय किया जाता है . आज तक कभी किसी तरह की स्वच्छ और निष्पक्ष समीक्षा नहीं की गयी . हर पान साल बाद नई पंचवर्षीय योजना आती है पैसों का बन्दर-बात होता है लेकिन आज तक कोई भी पंचवर्षीय योजना अपने लक्ष्यों को ५० फीसदी भी पूरा नहीं कर पायी , इस पर कोई जबाब है नेताओं के पास खास कर कांग्रेस के पास जिसने अधिकतम समय इस देश पर राज किया है ?
    गौर से देखा जाए तो हमारे यहाँ योजनाओं को लागू करने से पूर्व व्यावहारिक परिक्षण करने के बजाय प्रयोग को हीं योजनाओं का रूप दे दिया जाता है . और यही अब तक की सबसे बड़ी भूल है . रही बात भ्रष्टाचार की तो वह पूरे समाज की जिम्मेदारी है . खुद इस पर गौर कीजिये कि ये अफसरशाह ये मंत्री -विधायक सब कहाँ से आते हैं ? किस समाज से इनकी उपज हुई है ? सच तो ये है कि सब अपने अपने औकात के हिसाब से भ्रष्ट हैं . कोई सौ -पचास में काम चलता है तो कोई लाखो-करोड़ों में खेलता है ………….. इस पूरे भ्रष्ट कहे जाने वाले व्यवस्था में हम भी एक अंग हैं और अपनी-अपनी कड़ी को अपनी जगह रखकर ठीक करना हीं हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए ? अब , ये बताइए इतना सब कुछ होने के बाबजूद भी जनता खामोश क्यों है आखिर क्या हो गया उसे जो कभी प्याज के दाम बढ़ने पर सरकार गिराया करती थी और कभी छात्रों के हॉस्टल का बिल ज्यादा आने से संपूर्ण क्रांति का माहौल खड़ा हो जाता था ? आज भोजन-पानी,शिक्षा ,स्वास्थ्य सबका बुरा हाल है ऐसा लगता है यहाँ महज कुछ लोग इसको पाने के लिए आरक्षित हैं ! fir

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